Monday, 31 May 2021

दो जून की रोटी

रोटी... रोटी ...रोटी......... दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,

गोल, मोटी, छोटी,  जैसी हो .....दो जून की रोटी,
आड़ी तिरछी भी बन जाती.......दो जून की रोटी,
मां के हाथ से प्यारी लागे....... दो जून की रोटी,
अमीर गरीब सभी खाते .........दो जून की रोटी,

रोटी ....रोटी .....रोटी............. दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है ..........दो जून की रोटी,
 
 किस्मत वालों को मिलती है .....दो जून की रोटी,
 पिता कमा कर लाते हैं .......दो जून की रोटी,
  मां घर बनाती है ,..............दो जून की रोटी ,
  तब जाकर बन पाती हैं ......दो जून की रोटी,

रोटी... रोटी ...रोटी......... दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,
 
किस्मत वालों को मिलती है .....दो जून की रोटी,
सबको कहां नसीब है ............दो जून की रोटी ,
बड़े जंग से मिलती है ............दो जून की रोटी,
 तब संग बैठकर खाते हैं .........दो जून की रोटी,
 
रोटी... रोटी ...रोटी............... दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,

  भाग्य वालों को मिलती है..... दो जून की रोटी 
  अभागे से छिन जाती है .......दो जून की रोटी ,
  परदेस जाता है कमाने .........दो जून की रोटी 
  वहां खरीद के खाता है ........दो जून की रोटी,

रोटी... रोटी ...रोटी............. दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,

   अनमोल बड़ी है............... दो जून की रोटी 
   अपराध कराती है ये .........दो जून की रोटी 
   खून पसीना बहाती है.….... दो जून की रोटी
   आसानी से हाथ ना आती.... दो जून की रोटी

रोटी... रोटी ...रोटी......... दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,

अरमान सजाए बैठे हैं सब ......दो जून की रोटी,
 सबके नाम लिखी ना होती..... दो जून की रोटी,
 कुछ सम्मान से पाते हैं .........दो जून की रोटी ,
 अपमान सह कर कुछ पाते हैं ....दो जून की रोटी

रोटी... रोटी ...रोटी......... दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,

पापी पेट के डिमांड है .....दो जून की रोटी,
कुछ चोरी कर खाते........ दो जून की रोटी ,
 कुछ दान में खिलाते... ....दो जून की रोटी,
 सभी कमा कर खाते .......दो जून की रोटी,

रोटी... रोटी ...रोटी.............. दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,

जरूरत सभी की बन जाती......... .दो जून की रोटी,
दूध मुहे बच्चे को बिकवाती है .......दो जून की रोटी,
मां भी बिकती है देने बच्चे को ......दो जून की रोटी,
मान सम्मान से परे होती है ,........दो जून की रोटी,

रोटी... रोटी ...रोटी.............. दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,

जुदा अपने से करवा देती है .....दो जून की रोटी,
परदेस कभी बसा देती है........दो जून की रोटी,
जरूरत सभी की होती है........दो जून की रोटी,
जिसका नाम लिखा हो उस की होती.. दो जून की रोटी,

रोटी... रोटी ...रोटी.............. दो जून की रोटी,
 बड़े संघर्ष से बनती है........... दो जून की रोटी,
निशि द्विवेदी
 अंतर्राष्ट्रीय सचिव ,
साहित्य सेवा संस्थान, कानपुर उत्तर प्रदेश

Sunday, 30 May 2021

तुम को ही चाहता है दिल,

साजन बिन रहूं मैं कैसे ,
    कैसे जियूं मैं तुम बिन,

           मीलों लंबी लगी रातें,
                 सदियों से लंबा लगे लम्हा,

                         रुकती चलती रही सांसे,
                              सब कुछ अधूरा लगे तुम बिन,

महसूस खुद को मैंने ,
   कभी नहीं करती तुम बिन,

       पहाड़ों से ऊंचा दुख मेरा,
            बहुत ऊंचा लगे तुम बिन,

                  खुद को भी मैं सपना समझती ,
                       सपना समझती हूं तुम बिन,

                           साहित्यकार  ___  निशि दि्वेदी

Thursday, 27 May 2021

ये रेशम के रिश्ते

आसमानो से ऊंचे होते हैं यह" रेशम के रिश्ते"-२
पाताल से ज्यादा गहरे होते यह" रेशम के रिश्ते"-२

गंगा से भी पावन होते यह "रेशम के रिश्ते "-२
सागर से भी निर्मल होते यह "रेशम के रिश्ते "-२

शहद से ज्यादा मीठे होते हैं यह "रेशम के रिश्ते"-२
बर्फ से ज्यादा शीतल होते हैं यह" रेशम के रिश्ते"-२

भावनाओ की माटी में चलते"यह रेशम के रिश्ते"-२
श्रद्धा और विश्वास से सींचते" यह रेशम के रिश्ते"-२

प्रेम समर्पण से पूजते हैं यह" रेशल से रिश्ते"-२
तिल तिल कर के बढ़ते यह "रेशम के रिश्ते"२

तोड़े से भी ना टूटे यह" रेशम के रिश्ते"-२
सक की तलवारों से कटते यह" रेशम के रिश्ते"-२

टूटे कभी फिर ना जुड़ पाते हैं यह "रेशम के रिश्ते"-२
आंसू बन आखो से  गिरते यह "रेशम के रिश्ते"-२

कभी कपट से छले जाते हैं यह "रेशम के रिश्ते"-२
फिर टूट धरा बिखर जाते हैं यह" रेशम के रिश्ते"-२

 आंगन में किलकारी भरते यह "रेशम के रिश्ते"-२
दौलत से ना तोले जाते यह "रेशम के रिश्ते"-२

हीरे से अनमोल बड़े हैं यह "रेशम के रिश्ते -२
मोहन सा मोह  रखतें हैं यह "रेशम के रिश्ते"-२

रूप रंग और धर्म न देखें यह रेशम के रिश्ते"-२
वर्ण और शर्म न देखें यह "रेशम के रिश्ते"-२

पावन भक्ति से सराबोर होते हैं यह "रेशम के रिश्ते"-२
काली घटाओं से घनघोर होते हैं यह" रेशम के रिश्ते"-२

पैसों से कभी न तौले जाते ये "रेशम के रिश्ते"-२
भावनाओ के भूखे होते हैं यह" रेशम के रिश्ते"-२

अनमोल बड़े होते हैं यह" रेशम के रिश्ते"-२
कच्चे धागे से बंधे होते हैं" ये रेशम के रिश्ते"-२

‌   दोनों हाथों से चलते हैं ये"रेशम के रिश्ते"-२
,प्रेम की नरमी में बढ़ते हैं ये"रेशम के रिश्ते"-२


निशि, पिंकी द्विवेदी
(अंतर्राष्ट्रीय सचिव)
साहित्य सेवा संस्थान,

 

Monday, 24 May 2021

निशा का निमंत्रण

निधिवन चलो सबको देती आमंत्रण,
                         साथ रहो है निशा का निमंत्रण,
  हाथ पकड़ लो कस के सभी का,
                    सभी को मिला है निशा का निमंत्रण,
कान्हा ने हाथ पकड़ा है मेरा,
                     आया है मुझको निशा का निमंत्रण, ए दिन के उजालो तू खामोश हो जा,
                         भेजा है मुझको निशा ने निमंत्रण,
उजालो ने किया है धोखे से घायल ,   
                    लगाया निशा ने मेरे जख्मों पर मरहम,
रोशनी में दर्द को छुपाना है होता, 
                     दिखाया निशा ने मेरे जख्मों को दर्पण,
निशा को किया मैंने आत्मसमर्पण ,
                    जबसे निशा ने भेजा है मुझको निमंत्रण ,    दिन के उजाले मुझे रास ना आए,
                         लगाया है दिल से निशा का निमंत्रण,
 गाया है कवियों ने सुबह का वह नगमा, 
                       निशि दिन गांऊ मैं निशा का निमंत्रण, उजालों में लगाया है दुनिया का मेला,  
                               निशा में नहीं ऐसा कोई झमेला,  
उजालों ने किया मुझे सबसे पराया ,
                                   निशा ने मुझे अपना बनाया, उजालों में लगे कितने तानों के खंजर,              
                  अंधेरी हो या चांदनी देती अलग ही मंजर ,  माना कि चोर डाकू और लुटेरे,
                                 निशा को ही तो लगाते हैं फेरे,    मंदिर में फेरे हों सुबह सवेरे,
                     निधिवन में निशा को मेरे कान्हा के मेले,
 वृंदावन चलने का देती आमंत्रण ,                   
                        आ जाओ भक्तों है निशा का निमंत्रण, 
   सबस्क्राइब करके लगा लो तुम चंदन,
                        सभी को मैं देती निशा का निमंत्रण,
  दिन के उजालों में शोर बहुत है,
                              खामोश निशा है देती निमंत्रण,
  अगर दिल में तेरे हो प्रेम समर्पण,
                    लगाओ तुम गोते है निशा का निमंत्रण,   
 निशि गोपाल का रिश्ता अनोखा ,                            
                           दोनों के रंगों का भेद हो जानना ,
       तो आ जाओ तुमको है,
                                      मैं देती निशा का निमंत्रण ,  
  चाह शांति की गर हो दिल में तुम्हारे,
                    तो आ जाओ तुमको निशा का निमंत्रण,
    शांति इतनी कि भूल ना पाओगे ,
  कानों से आती है सनसनाहट तुम्हें है निशा का निमंत्रण,
  ये आमंत्रण निशदिन देती तुमको, मैं निशा का निमंत्रण ,    
  
निशी द्विवेदी-
अंतर्राष्ट्रीय सचिव
साहित्य सेवा संस्थान                                                 कानपुर उत्तर प्रदेश,                    

Monday, 17 May 2021

हैप्पी प्रॉमिस डे

राधा ओ राधा तुमसे है वादा,
    छोड़ के ना जाऊंगा किया है इरादा,
                    साथ निभाऊंगा मेरा है वादा,

मेरे बिना तुम कैसे जियोगी,
     कैसे जुदाई का जहर पियोगी,
              मेरे बिना तुम जी ना सकोगी,

दिल में तुम्हारे हमी हम रहेंगे,
जीवन का जहर हम संग संग पिएंगे,
तुम्हारे जीवन में कोई हो ना हो हम रहेंगे,

तुम्हारा साथ है हमको प्यारा,
तुम बिन ना होगा जीवन में उजाला,
           तुमसे साथ है हम को निभाना

कमी नहीं तुम्हारी जरूरत बनेंगे,
   हर सितम तुम्हारा हंसकर सहेंगे,
       आज तुमसे सारे हम वादे करेंगे,

विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव _____                                                        निशि द्विवेदी


मैं अंडा हूं,

मैं अंडा हूं,
 मैं चंगा हूं ,
ना लेता किसी से पंगा हूं,
मैं अंडा हूं ,
 कॉकरोच का,
चिपके हैं कुछ लाईन से,
सरकारी दफ्तर की फाइल से,
मैं अंडा हूं,
मैं अंधा हूं ,
ना देख सकूं मैं कुछ भी,
 मैं ऐसा बंदा हूं,
मैं बंद हूं अपने खोल में,
और फाइल बंद इस कमरे में,
मैं इस फाइल सा मजबूर हूं,
मुझे इंतजार कवर के फटने का,
फाइल को बाबू की जेब भरने का,
मैं दबा इस फाइल से,
 फाइल दबी कई फाइल से,
है यहां कई आते जाते,
कीड़े मकोड़ों जैसे,
चलते फिरते आगे बढ़ते,
मेरे भी और फाइल के करीब भी,
फिर भी ना कोई हाथ लगाता,
मुझे भी और फाइल को भी,
मैं चंगा था ,
मैं अंधेरे में संघर्ष में था,
मैं सुन रहा हूं,
कई सिसकियां,
जो दबी इन फाइलों में थी,
मैं सुन रहा था उनके दर्द को,
जो सच दफन था फाइलों में,
मैं पूछ बैठा इस फाइल से,
क्या सच्चाई है तेरी?
क्यों दबी है यहां अकेली?
वह बोली सुन ध्यान से,
 पिछले 11 सालों से,
मांग रही हूं न्याय ,
खाकी वर्दी वालों ने ,
करे विभिन्न उपाय,
बदल दिए असलाहै,
मैं फाइल हूं विमल मर्डर केस की,
जिसने झगड़ा होने पर पुलिस लियो बुलाए,
थाने से चले दो सिपाही आए,
सतीश ने फिर उनके सामने,
अपनी पिस्टल से गोली दीया चलाए,
पुलिस पकड़ कर ले गई उनको,
और बदल दी असलाहै,
मजिस्ट्रेट ने कह दिया,
यह वह असलाह ना आए,
सच दबा पड़ा फाइल में,
झूठ हंस-हंसकर उत्सव रहा मनाए,
मैं अंडा था,
 मैं चंगा था,
जब तक दुनिया से अनजान था,
मैं संघर्षरत था सच सुनने से पहले,
मैं सुनकर दुखी हो गया हूं,
मैं निष्क्रिय पड़ा हूं,
नहीं देखनी मुझे बाहर दुनिया,
जिस दुनिया में झूठ का बोलबाला,
और सच का मुंह दबा डाला।।।।।

इस सरकार को पैसे देकर, तुमने लिया खरीद।
उस सरकार से न पाओगे ,न मिलेगी भीख।।

विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव 
___निशि द्विवेदी




Tuesday, 11 May 2021

मां तू मुझसे क्यों इतनी नफरत करती,

मां तू मुझे क्यों नहीं समझती,
                                   मैं तेरी ही तो बेटी हूं,
 मैं तुझसे प्यारी प्यारी बातें ,
                                  करने को तरसती हूं,
  मां तू मुझसे क्यो इतनी ,
                                  नफ़रत करती ,
मैंने तेरा ही कहना माना ,
                       तेरी ही पसंद से ब्याह रचाया, 
ससुराल में सारे रिश्ते को ,
                                  अच्छे से निभाया,   
 जो तूने सिखाया,
                     वही तो दोहराया है  ,
याद है मुझे तेरे हाथों के बने ,
                                   खाने का स्वाद  ,       
 सोते समय मेरे बालों को ,
                               तेरा धीरे से सैहलाना,
 मेरे सर के नीचे वह धीरे से,
                                 तेरा तकिया लगाना, 
ठंड में मुझे कंबल में छुपाना,                                                                                                                                वह गर्मी में तेरा पंखा डोलाना ,                मेरी शादी कर, 
                 मुझसे लिपट कर सीने से लगाना,
आज तेरा मुझसे  यूं अचानक,
                                   खफा हो जाना, 
मां तू मुझे क्यों नहीं समझती,
                                  मैं तेरी ही तो बेटी हूं,  
तेरी हर खुशी को,
                       पूरी शिद्दत से निभाया है, 
तुम मेरे सपनों को,
                       कभी नहीं समझी,
तेरे लिए मैंने रौंद डाले सपने,
                           जो देखे थे खुली आंखों से,                                                              
मां तू मुझे क्यों नहीं समझती,
         मैं तुझसे प्यारी -२बातें करने को तरसती,
तू मुझसे क्यों इतनी नफरत करती,
                         मां तू मुझे क्यों नहीं समझती,
तुझे लगता है कि मैं नहीं समझती,
            मां तू मुझे अननोन नंबर से कॉल करती,
मेरी हेलो को तू खामोशी से सुनती ,  
                       ‌ ‌            तू जवाब नहीं दे सकती,  
  मां तू मुझसे क्यों इतनी नफरत करती , 
                                         मैं तेरी ही तो बैठी हूं                           
 रचनाकार                        ्््््््््््््््््््््््््््््््््््््््््      _   निशा तिवारी                           
 

Monday, 3 May 2021

नानी घर के वृक्ष

मेरी नानी के घर के बाहर एक बरगद का वृक्ष है,
जब से होश संभाला मैंने तब से खड़ा वह वृक्ष है,

एक दिन मैंने मां से पूछा कितना पुराना यह वृक्ष है,
मां बोली जब से होश संभाला यही खड़ा यह वृक्ष है,

 मां से बोली बता मुझे मां  कितना पुराना वृक्ष है,
जब मां छोटी थी जिज्ञासा में आया था यह वृक्ष है,

तब मां ने नानी से पूछा माँ कितना पुराना यह वृक्ष है,
नानी ने बताया उनके दादा ने था लगाया यह वृक्ष हैं,

मेरी जिज्ञासा पूर्ण हुई मैं पहुंची और बोली
बरगद दादा बता मुझे कितना पुराना यह वृक्ष है,

निशी उर्फ पिंकी द्विबेदी

बरगद दादा ने मुझे बहुत लंबी कहानी सुनाई 
फुर्सत में किसी दिन सुनाऊं की सारी कहानी

वृक्ष की अभिलाषा

वृक्ष हरा, घना रूप में विशाल हूं,
   जीवनदान काम है,
       धरा पर अटल खड़े,
            तले वृक्ष नदी बहे,
  बांह फैला हम यहां अटल खड़े,अटल खड़े,
     विहंग साख साख है,
        चातक,मयूर,कोकिला,
          मधुर गीत गा रहे,
 उद्दंड वानर शाख को हिला रहे, हिला रहे,
    पक्षी घोसले धरे,
       कांधे पर मेरे बसे,
           चोच से प्रहार करें,
धने तने को मेरे आसरा बना रहे,आसरा बना रहे,
पुष्प लताओं के झुंड,
अमृता गिलोय भी,
परिवेश को महका रहे,
तने तले पे चींटियों के बिल बने,बिल बने,
मोटी मोटी चीटियां,
कुछ लाल है चीटियां,
समूह को बना रहे,
भुजंग भी मेरे कोटरो में जा रहे, कोटरों में जा रहे,
काले कुछ छोटे बड़े,
शाख पर रेंगते,
धरा को है देखते,
डाल पर मेरी लाखों पत्ते जड़े, लाख पत्ते जड़े, 
 मधुर फल यहां लगे,
 फल पक धरा गिरे,
 कुछ नदी बीच गिरे,
 मधु के छत्ते भी मेरे साख पर लगे,मेरी साख पर लगे,
 मधु को बना रही,
 प्रकृति को सजाए रही,
 खुशी के गीत गा रही,
 बन पिता यहां हम ढाल बंन खड़े, ढाल बन खड़े,
 आंधी और तूफान से,
 लु और तपन से भी,
 बारिश की हर बूंद से,
 सभी को बचा रहे फर्ज को निभा रहे, फर्ज को निभा रहे,
 एक पथिक नदी तटे,
 लगा बड़ा थके थके,
 दूर से चले चले,
 फलों को निहार रहा धरा पर खड़े खड़े, धरा पर खड़े खड़े,
 डाल दिए वहीं पर,
  चार फल पके पके,
  खा के फल जल पिए,
 आभार व्यक्त किया वृक्ष तले खड़े-खड़े, खड़े ,
 कल जोर वृक्ष कहे,
 आभार बोल के मुझे,
  लघु मत कीजिए,
  कह रहा हूं जो मैं उसे सुन लीजिए, उसे सुनने लीजिए
  वृक्ष मत काटिए,
  परिवेश पलने दीजिए,
 धरा करो हरा भरा,
 मनुष्य की तरह हमें भी रहने दीजिए, हमें भी रहने दीजिए,
 जन्म से लेकर मृत्यु तक,
  तेरे काम आए ,
  मेरी ही लकड़ियां, मेरी ही लकड़ीया
 पुत्र जने जैसे घर,
 वृक्षारोपण कीजिए,
 मॉल बने ना बने , 
 वृक्ष रहने दीजिए, हमें भी रहने दीजिए,
 ऑक्सीजन का हूं कारखाना,
  ऐसे बढ़ने दीजिए,
  सृष्टि यह सभी की है,
  चक्र चलने दीजिए इन्हें पनपने दीजिए,
  हरा वृक्ष ना काटिए,
  पांच वृक्ष लगाइए,
  गमलों को सजाइए,
   क्यारी को महकाईये
    हरा भरा बनाइए,
   प्रकृति को अब और ना उजाड़ीये ,
   चलिए हाथ में लाइए,
    मिला के हाथ अपने देश को बचाईऐ,
    महामारी से बचाइए,
     यही पाठ अपने बच्चों को सिखाइए,
    इस धरा को अपने गहना पहनाइए

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव  ___निशी उस पिंकी दुबेदी
 
 
   

सबसे प्यारा मेरा कान्हा!

सबसे प्यारी सूरत कान्हा,
      सबसे प्यारा कान्हा नाम है,
            वांह फैलाकर मांगू दुआ,
                 कोई नहीं अनजान है,

प्यार की प्रतिमूर्ति हो,
      दयालु तेरा नाम है,
             संसार से तुम हो ,
                   तुमसे ही संसार है,

मिटा दो यह महामारी,
     हर लो मेरी चिंता सारी,
          तेरा नाम बड़ा अनमोल,
               जपन में लागे कोई ना मोल ,     
   
गोवर्धन को उठाया,
    शेष सिर तांडव दिखाया,
         पूतना के प्राण खींच रुलाया,
                 महा पापी कंस को मिटाया,

इस सृष्टि को पावन कर दो,
     जीवन में फिर से रस भर दो,
               दिल में  जगा  दो  भक्ति,
                    अब दिखा दो अपनी शक्ति,

हम तेरे दर पर आएंगे , 
     सदा तेरी महिमा गाएंगे,
           भक्ति की गंगा बहाएंगे,
                  तेरे चरणों में घर बनाएंगे,

विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव -
                               (पिंकी ) निशि द्विवेदी

वृक्ष की पुकार,

वृक्ष हरा, घना रूप में विशाल हूं,
   जीवनदान काम है,
       धरा पर अटल खड़े,
            तले वृक्ष नदी बहे,
  बांह फैला हम यहां अटल खड़े,अटल खड़े,
     विहंग साख साख है,
        चातक,मयूर,कोकिला,
          मधुर गीत गा रहे,
 उद्दंड वानर शाख को हिला रहे, हिला रहे,
    पक्षी घोसले धरे,
       कांधे पर मेरे बसे,
           चोच से प्रहार करें,
धने तने को मेरे आसरा बना रहे,आसरा बना रहे,
पुष्प लताओं के झुंड,
अमृता गिलोय भी,
परिवेश को महका रहे,
तने तले पे चींटियों के बिल बने,बिल बने,
मोटी मोटी चीटियां,
कुछ लाल है चीटियां,
समूह को बना रहे,
भुजंग भी मेरे कोटरो में जा रहे, कोटरों में जा रहे,
काले कुछ छोटे बड़े,
शाख पर रेंगते,
धरा को है देखते,
डाल पर मेरी लाखों पत्ते जड़े, लाख पत्ते जड़े, 
 मधुर फल यहां लगे,
 फल पक धरा गिरे,
 कुछ नदी बीच गिरे,
 मधु के छत्ते भी मेरे साख पर लगे,मेरी साख पर लगे,
 मधु को बना रही,
 प्रकृति को सजाए रही,
 खुशी के गीत गा रही,
 बन पिता यहां हम ढाल बंन खड़े, ढाल बन खड़े,
 आंधी और तूफान से,
 लु और तपन से भी,
 बारिश की हर बूंद से,
 सभी को बचा रहे फर्ज को निभा रहे, फर्ज को निभा रहे,
 एक पथिक नदी तटे,
 लगा बड़ा थके थके,
 दूर से चले चले,
 फलों को निहार रहा धरा पर खड़े खड़े, धरा पर खड़े खड़े,
 डाल दिए वहीं पर,
  चार फल पके पके,
  खा के फल जल पिए,
 आभार व्यक्त किया वृक्ष तले खड़े-खड़े, खड़े ,
 कल जोर वृक्ष कहे,
 आभार बोल के मुझे,
  लघु मत कीजिए,
  कह रहा हूं जो मैं उसे सुन लीजिए, उसे सुनने लीजिए
  वृक्ष मत काटिए,
  परिवेश पलने दीजिए,
 धरा करो हरा भरा,
 मनुष्य की तरह हमें भी रहने दीजिए, हमें भी रहने दीजिए,
 पुत्र जने जैसे घर,
 वृक्षारोपण कीजिए,
 मॉल बने ना बने , 
 वृक्ष रहने दीजिए, हमें भी रहने दीजिए,
 ऑक्सीजन का हूं कारखाना,
  ऐसे बढ़ने दीजिए,
  सृष्टि यह सभी की है,
  चक्र चलने दीजिए इन्हें पनपने दीजिए,
  हरा वृक्ष ना काटिए,
  पांच वृक्ष लगाइए,
  गमलों को सजाइए,
   क्यारी को महकाईये
    हरा भरा बनाइए,
   प्रकृति को अब और ना उजाड़ीये ,
   चलिए हाथ में लाइए,
    मिला के हाथ अपने देश को बचाईऐ,
    महामारी से बचाइए,
     यही पाठ अपने बच्चों को सिखाइए,
    गज भर धरा पर मुझे लगाइए,
थोड़ा जल् लाइए,
इस धरा को गहना पहनाईऐ,
 
 विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव-
                                      निशि पिंकी द्विवेदी,
   
   
 

सृष्टि के निर्माता कृष्ण हमारे ॥

पृकृति के इस चित्र को किसने बनाया?

हरी-भरी धरा को खुशबू से महकाया,

रंग बिरंगे फूलों से धरती को सजाया,

वादियों को खुशमिजाज जिसने बनाया,

बारिश की बूंदों से किसने नहलाया,

धुप की रोशनी से धरा को चमकाया,

चांद की चांदनी को पूर्णमासी से दमकाया,

लगाकरअमावस्या का टीका बुरी नजर से बचाया,

 झोंक रहे हैं वरिष्ठ जन महामारी की भट्टी में,

डगमगा रही है नैया प्रभु तुमको पार है करनी ,

Wednesday, 28 April 2021

वृक्ष की पुकार,

वृक्ष हरा, घना रूप में विशाल हूं,
   जीवनदान काम है,
       धरा पर अटल खड़े,
            तले वृक्ष नदी बहे,
  बांह फैला हम यहां अटल खड़े,अटल खड़े,
     विहंग साख साख है,
        चातक,मयूर,कोकिला,
          मधुर गीत गा रहे,
 उद्दंड वानर शाख को हिला रहे, हिला रहे,
    पक्षी घोसले धरे,
       कांधे पर मेरे बसे,
           चोच से प्रहार करें,
धने तने को मेरे आसरा बना रहे,आसरा बना रहे,
पुष्प लताओं के झुंड,
अमृता गिलोय भी,
परिवेश को महका रहे,
तने तले पे चींटियों के बिल बने,बिल बने,
मोटी मोटी चीटियां,
कुछ लाल है चीटियां,
समूह को बना रहे,
भुजंग भी मेरे कोटरो में जा रहे, कोटरों में जा रहे,
काले कुछ छोटे बड़े,
शाख पर रेंगते,
धरा को है देखते,
डाल पर मेरी लाखों पत्ते जड़े, लाख पत्ते जड़े, 
 मधुर फल यहां लगे,
 फल पक धरा गिरे,
 कुछ नदी बीच गिरे,
 मधु के छत्ते भी मेरे साख पर लगे,मेरी साख पर लगे,
 मधु को बना रही,
 प्रकृति को सजाए रही,
 खुशी के गीत गा रही,
 बन पिता यहां हम ढाल बंन खड़े, ढाल बन खड़े,
 आंधी और तूफान से,
 लु और तपन से भी,
 बारिश की हर बूंद से,
 सभी को बचा रहे फर्ज को निभा रहे, फर्ज को निभा रहे,
 एक पथिक नदी तटे,
 लगा बड़ा थके थके,
 दूर से चले चले,
 फलों को निहार रहा धरा पर खड़े खड़े, धरा पर खड़े खड़े,
 डाल दिए वहीं पर,
  चार फल पके पके,
  खा के फल जल पिए,
 आभार व्यक्त किया वृक्ष तले खड़े-खड़े, खड़े ,
 कल जोर वृक्ष कहे,
 आभार बोल के मुझे,
  लघु मत कीजिए,
  कह रहा हूं जो मैं उसे सुन लीजिए, उसे सुनने लीजिए
  वृक्ष मत काटिए,
  परिवेश पलने दीजिए,
 धरा करो हरा भरा,
 मनुष्य की तरह हमें भी रहने दीजिए, हमें भी रहने दीजिए,
 पुत्र जने जैसे घर,
 वृक्षारोपण कीजिए,
 मॉल बने ना बने , 
 वृक्ष रहने दीजिए, हमें भी रहने दीजिए,
 ऑक्सीजन का हूं कारखाना,
  ऐसे बढ़ने दीजिए,
  सृष्टि यह सभी की है,
  चक्र चलने दीजिए इन्हें पनपने दीजिए,
  हरा वृक्ष ना काटिए,
  पांच वृक्ष लगाइए,
  गमलों को सजाइए,
   क्यारी को महकाईये
    हरा भरा बनाइए,
   प्रकृति को अब और ना उजाड़ीये ,
   चलिए हाथ में लाइए,
    मिला के हाथ अपने देश को बचाईऐ,
    महामारी से बचाइए,
     यही पाठ अपने बच्चों को सिखाइए,
    गज भर धरा पर मुझे लगाइए,
थोड़ा जल् लाइए,
इस धरा को गहना पहनाईऐ,
 
 विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव-
                                      निशि पिंकी द्विवेदी,
   
   
 

Tuesday, 27 April 2021

करो ना महामारी पर

निशब्द हुयी धरती है,
                               गगन  तार  तार  है,
दुखों का आगाज है,
                         हर तरफ चीख पुकार है,
कोरोना महामारी है,
                         भारत के बुरे हालात है,
शून्य हैं मस्तिष्क सबके,
                            भाव में  बौखलाहट है,
रो रहा प्रकृति का जर्रा जर्रा,
                         डर से मनुष्य रहा थर थरा,
रो रही माताएं , बच्चे, बहने ,
                                     उजर  रहा  सिंदूर,
अंधियारा है चारों ओर,
                                   उम्मीद  नहीं  दूर  दूर,
परेशानियों का हर तरफ डेरा है,
                     जल्द होना उम्मीदों का सवेरा है,
कुछ नहीं बस प्रकृति का खेला है,
                     मनुष्य ने भी प्रकृति से खेला है,

विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव 
                                           -निशि  द्विवेदी

Monday, 26 April 2021

देश की हालत

चिताओं पर चडगई हंड़िया, 
                           चिकित्सक बटोर रहे गड्डियां,

बिगाड़ रहे हो अपनी करनी,
                            दूध दूह रहे क्यों तुम चलनी,

चुप क्यों बैठे हैं पुराने दरबारी,
                            क्या है बोले उनकी लाचारी,

कालाबाजारी है कब तक चलनी,
                   भूलो मत जैसी करनी वैसी भरनी,

क्या चुनाव है इतना जरूरी,
                         नहीं दिखती उन्हें की मजबूरी,

फैल रहा है काल का पांव,
               धधक उठी चिताये शहर हो या गांव,

ताबड़तोड़ है जारी,
                          ऑक्सीजन की कालाबाजारी,

नहीं है हम सरकार के विरुद्ध,
                    समाचारों से कंठ हो रहा अवरुद्ध,

विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___
                                       निशी,पिंकी द्विवेदी

Saturday, 24 April 2021

सपनों की दुनिया,

                 ___  सपने  ____

                       कुछ हंसाते सपने अपने,
                        कुछ  रुला हमें  जाते हैं,
                        कुछ आए बनकर अपने
                        कुछ  बना हमें  जाते  हैं,

कुछ सजा गए हमको,
कुछ सज कर रह जाते हैं,
कुछ साथ निभाते अपना,
 तो कुछ छोड़ चले जाते हैं,

                           कुछ श्रृजन बन कर आते हैं,
                            कुछ हमारे बन रह जाते हैं, 
                           कुछ साजन बन रह जाते हैं,
                            जीवन भर साथ निभाते हैं,

कुछ तकदीर नहीं होते हैं,
वो याद सदा हमें आते हैं,
कुछ तकदीर में हो कर भी,
 कुछ हमसे छीन  जाते  हैं,

                                 कुछ बंद आंखों से दिखते ,
                                 और हमें सोने को कहते,
                                 कुछ खुली आंखों से दिखते,
                                 और हमारी नींद उड़ा जाते हैं,

 कैसे-कैसे सपने होते,
 सोच हमें हंसी आती है,
कुछ अन सुलझे सपने ,
हमें और उलझा जाते हैं, 

                                 कुछ दिवास्वप्न होते हैं ,
                                 जो पूरे कभी नहीं होते हैं,
                                कुछ सुबह के सपने होते हैं, 
                                 वह दृढ़ संकल्प से पुरे होते,


विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव____
                                      निशि (पिंकी) द्विवेदी

कोरोना से देश को बचाना है।

कितने नीरस दिन है,
                             कैसी है महामारी है,
खौफनाक आभा पृकृति की,
                         जीवन से जंग जारी है,
 दौड़ रहे चिकित्सा वाहन,
                         कम पड़ रहे शव वाहन,
दिन में भी हो रहे अंधकार,
                   वेटिंग में हो रहे दाह संस्कार,
सूना सूना है हर एक मंजर,
                      गंगा तैरे राख अस्थि पंजर,
आग उगल रहे वृक्ष लगाएं,
                      जो कभी सुंदर सजती थी,
कांटे तो खुश हो जैसे,
                            फूल तो जैसे रो रहे हैं,
कितना दर्द हवाओं में है,
                       हवाएं जैसे सुर् खो रहे हैं, 
जो सदा गुनगुनाती थी ,
                         जो सदा सुखद होती थी,
जगह नहीं अस्पतालों में,
                       सड़कों पर दम तोड़ रहे हैं,
जनहित कहता था चलो अस्पताल,
                          आज कह रहा  स्टे होम,
कभी खिल के हंसते थे यहां,
                        आज रो रहा मेंरा रोम रोम,
सीख रही है धरती पल पल,
                        रो रहा है गगन भी हर पल,
 हर घर में बीमारी पसरी,
                                दुखों ने घर को घेरा है,
भटक रहे हैं वाहन लेकर,
                      चौराहे बैठा खुलेआम लुटेरा है,
परेशानियों से घिरकर,
                            हो गई सबकी बुद्धि आधी,
अगर टूटा कोई नियम धोखे से,
                      पुलिस की तो भैया हो गई चांदी,
कमाया नहीं साल से कुछ भी,
                          टैक्स सरकारी चुकाना जारी,
कहते हैं आज आजाद देश है ,
                             नजर नहीं आती आजादी,
टेंशन से घिर रहा मनुष्य है,
       कोरोना नहीं हार्ट अटैक से मर रहा मनुष्य है,
नेताओं की लाचारी देखो,
                                    चुनाव कराना जारी है,
क्या करोगे इतना धन,
                     हो जाएगा एक दिन समाप्त जीवन,
वक्त है अभी संभल जाओ,
             जागो ,उठो, दौड़ो ,भागो देश को बचा लो।।
विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव___
                                              निशी पिंकी त्रिवेदी

कोरोना से देश को बचा लो।

कितने नीरस दिन है,
                             कैसी है महामारी है,
खौफनाक आभा पृकृति की,
                         जीवन से जंग जारी है,
 दौड़ रहे चिकित्सा वाहन,
                         कम पड़ रहे शव वाहन,
दिन में भी हो रहे अंधकार,
                   वेटिंग में हो रहे दाह संस्कार,
सूना सूना है हर एक मंजर,
                      गंगा तैरे राख अस्थि पंजर,
आग उगल रहे वृक्ष लगाएं,
                      जो कभी सुंदर सजती थी,
कांटे तो खुश हो जैसे,
                            फूल तो जैसे रो रहे हैं,
कितना दर्द हवाओं में है,
                       हवाएं जैसे सुर् खो रहे हैं, 
जो सदा गुनगुनाती थी ,
                         जो सदा सुखद होती थी,
जगह नहीं अस्पतालों में,
                       सड़कों पर दम तोड़ रहे हैं,
जनहित कहता था चलो अस्पताल,
                          आज कह रहा  स्टे होम,
कभी खिल के हंसते थे यहां,
                        आज रो रहा मेंरा रोम रोम,
सीख रही है धरती पल पल,
                        रो रहा है गगन भी हर पल,
 हर घर में बीमारी पसरी,
                                दुखों ने घर को घेरा है,
भटक रहे हैं वाहन लेकर,
                      चौराहे बैठा खुलेआम लुटेरा है,
परेशानियों से घिरकर,
                            हो गई सबकी बुद्धि आधी,
अगर टूटा कोई नियम धोखे से,
                      पुलिस की तो भैया हो गई चांदी,
कमाया नहीं साल से कुछ भी,
                          टैक्स सरकारी चुकाना जारी,
कहते हैं आज आजाद देश है ,
                             नजर नहीं आती आजादी,
टेंशन से घिर रहा मनुष्य है,
       कोरोना नहीं हार्ट अटैक से मर रहा मनुष्य है,
नेताओं की लाचारी देखो,
                                    चुनाव कराना जारी है,
क्या करोगे इतना धन,
                     हो जाएगा एक दिन समाप्त जीवन,
वक्त है अभी संभल जाओ,
             जागो ,उठो, दौड़ो ,भागो देश को बचा लो।।
विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव___
                                              निशी पिंकी त्रिवेदी

Friday, 23 April 2021

मास्क है ब्रह्मास्त्र,

कोरोना कॉल चल रहा है,
    बाहर जाना भी जरूरी है,
          रात को गर्म दूध में लेना,
               थोड़ी हल्दी बहुत जरूरी है

भागदौड़ भरी जिंदगी में,
    थोड़ा रुकना भी जरूरी है,
         लाखों बिछड़ गए अपनों से,
              इसलिए ठहरना बड़ा जरूरी है,

       प्रातः काल उठकर थोड़ा ,
         करो योगासन कपालभाति,
           स्वस्थ रखो अपने फेफड़े छाती,
              खुल कर जी लो तुम्हें है आजादी,

भूखे पेट कभी ना रहना,
   ग्रीन टी, काढा लो दो बार,
        भारी भोजन करो नहीं तुम,
             खिचड़ी दलिया लो बार-बार,

 पैसे की चिंता मत करना,
      और कमाना करदो बाकी,
           घर बैठ कर खा लो पी लो 
                जीवन  बड़ा  अनमोल  है,
            
 याद करो तुम दादी नानी,
       भूल गए जो बातें  सारी,
            भाग्यवान के धन पड़ जाए,
                और जाऐ जान अभागे की,

मुंह , नाक को ढक कर रखना,
   सैनि्, साबुन हाथ लगाते रहना,
       इससे बच जाएगी जान तुम्हारी
               और  बचे   जान   अपनों   की,

मेरे लिए ना रोए मेरे प्यारे,
     खुशियों भरे हो सारे सपने,
          चेन तोड़ दो महामारी की ,
                 भारत के भावी वीर पुत्र हो,

 मां की लाज सदा रखना,
     मास्क चढ़ा कर नाक पर रखना,
             इसमें शान तुम्हारी है,
                  कसम तुम्हें है माटी की,

कल किसी मां का बेटा मिट्टी ना बने,
     ना मिटे किसी सुहागन का सिंदूर,
            न  रूठे  किसी  बहन  से   राखी,
                ना छिने किसी से बुढ़ापे में लाठी,

एक मास्क ही इकलौता शस्त्र है,
      जो कोरोना को करता निरस्त है,
           कल से यह मंत्र सभी को दोहराना है ,
                     इस कोरोना को जड़ से मिटाना है,

 विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव __
                                                  निशि द्विवेदी

Monday, 15 February 2021

विश्वकीर्ति

दोस्तों विश्वकीर्ति एक बहुत ही खूबसूरत महिला के संघर्ष की कहानी है स्नो वाइट की जैसी खूबसूरत दूध जैसे सफेद, रूप रंग और  सब कुछ दिया ईश्वर ने बस किस्मत से ही कमजोर दिया। उसके संघर्ष की कहानी
क्या होता है आगे देखते हैं_______

 मिडिल क्लास फैमिली में जीवन यापन करने वाली उर्मी शादी को पांच वर्ष हो चुके हैं एक चार साल का बेटा है दूसरा बच्चा चाहने की मंशा में डॉक्टरों से इलाज ले रही थी परंतु कुछ ना हुआ , एक दिन किसी ने कहा कि प्रदोष का व्रत करें शिव जी की कृपा से उसके घर में  बच्चा आएगा।
ऊर्मी ने व्रत रहना शुरू किया वह प्रत्येक प्रदोष को शिव जी के मंदिर जाती है पूजन करती और उनसे प्रार्थना करती उसका पुत्र सोनू भी उसके साथ जाता शिवलिंग पर जल अर्पण करता और दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हे भोलेनाथ मुझे भी एक बोलने वाला बबुआ दे दो जो मेरे हाथों में राखी बांधे और मेरे साथ खेले दादी मुझे ताने मारती है बड़वा कहती है।
भोलेनाथ तो भोले थे अबोध बालक की प्रार्थना सुन ली और उर्मी का गर्भ ठहर गया ।
 ससुराल में सभी उसको ताने मार रहे थे ज्यादा सो मत नहीं तो बेटी हो जाएगी,बाया पैर नहीं दाया पैर आगे बढ़ाओ नहीं तो बेटी हो जाएगी, बासी रोटी खाओ बच्चे के बाल बहुत अच्छे होंगे ,सभी को घर में उर्मी से यही आशा थी कि वह पुत्र को जन्म दे । उर्मि हर बात को हंसी में टाल देती ,नव महीने गर्भ से है ,ससुराल में सास ननंद उस दिन का इंतजार कर रही हैं ।
धीरे-धीरे दिन करीब आ रहे थे उर्मि को दर्द हो रहा था हॉस्पिटल गई और एक लड़की का जन्म होता है।
डॉक्टर चंद्रकांता( बहुत सुंदर थी उन्हें सुंदरता का खिताब भी मिल चुका था मिस इंडिया रह चुकी थी) प्रसूति उन्हीं के हाथों से होती है,बहुत खूबसूरत परियों सी सुंदर बच्ची को हाथ में लेते हुए उनके मुंह से यकायक निकल गया, लक्ष्मी आई है यह बच्ची विश्व में नाम करेगी इसकी कीर्ति चारों दिशाओं में रोशनी की तरह फैलेगी इसका नाम विश्वकीर्ति रखना।
बेटी के जन्म से मां-बाप और पूरे परिवार में एक गम का माहौल सा छा गया ,सभी लोगों ने माथा ठोका बेटी के जन्म से दहेज की चिंता होने लगती है।
लेकिन उस नवजात शिशु के मन पर क्या बीत रही  उसके कदम रखते ही घर में गम का माहौल सा छा गया।
नर्स बच्चे को लेकर उर्मी की सास के पास जाती है और कहती है लक्ष्मी आई है नेक दो।
सासू झुललाकर कहती है लक्ष्मी है तो तुम ही रख लो , बेटा होता तो देती बेटी है क्या दूं मैं तुझे और क्या रखूं इसके दहेज के लिए तू यहां से जा और इसे भी ले जा!
 कदम बढ़ाते हुए वापस अपने घर आ जाती है ंं
नर्स बच्चे को लेकर पिता के पास जाती है कहती है लक्ष्मी आई है खुशहाली के रूप में कुछ पैसे दीजिए,
पिता माथा ठोकते हुए कहते हैं क्या खुशी क्या गम मैं क्या दूं समझ नहीं आता बेटी का बोझ में कैसे उठा पाऊंगा ।सर झुकाना पड़ेगा, दूसरों के द्वार जाना पड़ेगा ,पाव छूने पड़ेंगे ,गिड़गिड़ाना पड़ेगा, नाक रगड़ना पड़ेगा
जीवन भर की कमाई तो देनी ही पड़ेगी साथ में सुख दुख में परेशान होना पड़ेगा सुख मिला तो ठीक और दुख मिला तो जी नहीं पाऊंगा समझ नहीं आता क्या होगा।
पिता को दुखी देखकर नर्स वापस आ गई कुछ बिना बोले क्या बोल सकती थी वह भी परेशान हो गई।
नवजात शिशु के ह्रदयपटल पर इन सब बातों का बहुत बुरा असर पड़ रहा था नर्स ने बच्चे की ओर देखा आंखें खोल कर सब सुन रही थी नर्स ने बड़े प्यार से उसकी ओर देखा बच्ची पर हाथ फेरते हुए दुखी हो गई। ‌
बच्ची ने अपनी आंखें बंद कर ली ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह मन ही मन ईश्वर से वार्तालाप कर रही है।
हे ईश्वर ये मुझे कहां भेज दिया जहां धन का इतना अभाव है वहां आपने और तकलीफ बढ़ा दी ।्
उर्मी बच्चे के साथ तीन दिनों तक हॉस्पिटल में रहती है
सभी बस मजबूरी बस उससे मिलने जाते हैं किसी के चेहरे पर खुशी नहीं थी केवल डॉक्टर दीदी बड़ी खुशी खुशी आती थी बच्ची को खिलाती थी हालचाल पूछती थी और चली जाती थी उनके छूने से बच्चे को खुशी मिलती थी। आज उर्मी का बेटा सोनू अपनी बुआ की गोद में आता है अपनी बहन को देखकर खुशी से उछल पड़ता है नर्स उसे उछलते खेलते देखकर खुश होती है और पूछती है, यह बेबी कौन है तुम्हारा.....?.
सोनू से पकड़ते हुए जवाब देता है..... !!!!मेरी बहन है ,भोलेनाथ ने दिया है ,मैंने उनसे मांगा थ !!
नर्स ने सामने लेटी दूसरी महिला की ओर इशारा करते हुए कहा यह बेबी मुझको दे दो वह वाला बेबी तुम लोगे?
वह बेटा है जब तुम बड़े हो जाओगे तुम्हारे साथ खेलेगा तुम्हारे साथ पढ़ने जाएगा ,यह बहन हमको दे दो !!!!तुम्हारे साथ नहीं खेल पाएगी बहुत छोटी है;
तभी सोनू ने तपाक से जवाब दिया नहीं वह बबुआ तो काला काला है, मेरी बहन गोरी गोरी है मैं नहीं बदलूंगा अपनी बुआ से कहता है इसको बैग में रखकर अपने घर ले चलो नहीं तो कोई ले लेगा। यह बड़ी मुश्किल से मुझे मिली है मैंने मांगी है।
नर्स .....  नहीं अभी तुम इसे अपने घर नहीं ले जा सकते अभी इसको इंजेक्शन लगना है और डॉक्टर ने भी ले जाने से मना किया है। 
सोनू....._तो मैं भी यहीं रहूंगा ताकि कोई से चुरा ना ले जाए।
(उन दोनों की खींचातानी को देखकर सभी खुश हो रहे थे बस 3 दिनों बाद हॉस्पिटल से छुट्टी होती है सोनू अपनी बहन को लेकर भाग जाता है और बहुत खुश होता है बच्चे की खुशी देखकर सभी खुश थे घर में किलकारियां गूंज रही थी छोटे बच्चे की रोने की आवाज आ रही थी बच्चे की रोने की आवाज से आंगन गूंज उठा था)
मन दुखी था लेकिन सारे रीति रिवाज चल रहे थे वह खुशी ना थी जो सोनू के पैदा होने पर हुई थी।
बच्ची दिनों दिन बढ़ती जा रही थी और घर में लक्ष्मी भी बढ़ती जा रही थी पिता के कारोबार में तो तरक्की होने लगी थी सभी कह रहे थे बेटियां अपने भाग्य का लेकर आती हैं।
तभी अचानक एक आदमी आता है उर्मी के पति के हाथों में एक लिफाफा थमाते हुए कहता है__
भाई यह लो तुम्हारे ₹पाच हजार मुझे अचानक पैसे की जरूरत पड़ गई थी मैं तुमसे कर्ज लेकर अपने गांव चला गया था। मेरी मां बहुत बीमार थी अब वह ठीक है मैं गांव से वापस आ गया हूं कुछ बचे हुए पैसे हैं जो मैं तुम्हें वापस कर रहा हूं अपनी अमानत संभाले ।
उर्मी का पति__ क्या भाई ऐसा भी कोई करता है मैंने माल लेने के लिए पैसे आपको दिए थे आपने माल भी नहीं पहुंचाया और पैसे भी नहीं दिए आप समझ नहीं सकते हम इतने दिनों से कितनी तकलीफ उठा रहे थे। मुझे कहीं से माल नहीं मिला पत्नी भी हॉस्पिटल में एडमिट हो गई इलाज के लिए पैसे ब्याज पर लेने पड़े मुझे अरे कम से कम जाने से पहले बता तो देते मैं नहीं था तो दुकान के आसपास लोगों को बता देते संदेश तो पहुंचा देते हैं ऐसा कोई करता है।
  शर्मिंदा होकर क्षमा मांगता और वापस चला जाता है।
सभी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है खोया हुआ पैसा एकदम से मिल जाए यह तो वही बात हो गई की भगवान देता है तो छप्पर फाड़कर देता है।
तभी उर्मी अपने पति से कहती है कि देखिए हमारी बेटी कितनी भागयशाली है आते ही उसने आपके पैसे को वापस दिलवा दिया इससे बड़ा और क्या सबूत हो सकता है की बेटियां लक्ष्मी का रुप होती हैं।
आंख में आंसू भर कर अपनी बेटी को गोद में लेकर उस पैसे के ऊपर अपनी बेटी को लिटाते हुए उर्मी का पति कहता है मेरी बेटी लक्ष्मी का रूप नहीं साक्षात लक्ष्मी है अब वह इसी लक्ष्मी पर लेटेगी। आज उसकी छट्टी है और यह खोया हुआ पैसा सारा इसका है मैं इसे बैंक में जमा कर दूंगा यह पैसा मेरी बेटी की शादी में काम आएगा।

बेटी चंद्रमा की कला की तरह धीरे-धीरे बढ़ने लगती है और जितनी बड़ी होती है उतनी ही खूबसूरत होती है उसके रूप रंग को देखकर सभी अचंभित हो जाते हैं और कहते हैं यह डॉक्टर चंद्रकांता के हाथों का असर है उनके हाथों से जन्म लिया है बहुत सुंदर बेटी है। लोगों की बातों को काटते हुए उर्मी की सांस कहती है खूबसूरत बेटी से अच्छा बदसूरत बेटा होता है होता तो आखिर बेटा ही होता है बेटी किस काम की घर खालीकर चली जाती है।
कुर्मी का पति अपनी मां को चुप कराते हुए कहता है__
अम्मा अब बस भी करो मेरी बेटी बहुत नाम कमाए गी मैं उसे डॉक्टर बनाऊंगा आंखिर डॉक्टर चंद्रकांता भी तो एक महिला ही है वह भी तो किसी की बेटी है। हंसते हुए कहता है___तुम भी तो किसी की बेटी हो अगर तुम ना होती तो हम सब लोग कहां से होते हैं माना कि बेटा वंश चलाता है लेकिन उस वंश को जन्म देने के लिए तो बेटियां ही होती हैं।




आज तुम्हारी चिट्ठी आई

आज तुम्हारी चिट्ठी आई,
पिया मिलन की याद दिलाई
भूल गई मैं ऋतुएं सारी,
 बड़े जोर से मैं मुस्काई,

तुम बिन बदरंग जिंदगी
 सावन से बसंत ऋतु आई,
आंखों में वर्षा,
 उमंगों में पतझड़, 
होली भी बेरंग, 
और दिवाली पर दिल जलाए,

आज तुम्हारी चिट्ठी आई,
 लिखा नहीं कहीं पर भी था,
वापस कब तुम आओगे,
सूने मेरे घर आंगन को ,
कब-तक तुम महकाओगे,

आज तुम्हारी चिट्ठी आई,
खुशियों की सौगात है लाई,
जब से गए परदेस को साजन,
सूना पड़ा है घर और आंगन,
अब तो लौट आओ मेरे साजन,

आज तुम्हारी चिट्ठी आई ,
चंदन की खुशबू लाई,
क्या करोगे इतना धन,
 सूना पड़ा मेरा जीवन,
तुम बिन अब रहा न जाए,

 अबकी करो कुछ ऐसा वादा ,
कि अगले सावन साथ ही खेले,
 ऐसा ना हो कि बिना तुम्हारे ,
सावन मेरी जान ही ले ले,

विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव _____                                 निशि द्विवेदी

Saturday, 13 February 2021

बचपन की यादें करो तुम ताजा

बेटी बनकर जन्मी हूं,
                             बेटी को ना जीवन देना चाहूंगी।
जो दिन जीवन में अपने देखें,
                             बेटी के जीवन में ना चाहूंगी।
सुना था पापा रो पड़े थे,
                               मेरा जन्म सुनने के बाद।
सब ने माथा ठोका था ,
                               मेरा जन्म होने के बाद।
मां को भी था देखा उदास  ,
                            बेटा होता तो बधाई मिलती ,
  नर्स भी बैठी थी उदास,
                               बड़ा रूआना मंजर था,
      सभी बैठे थे उदास,
                               टुकुर-टुकुर मैं देख रही थी ,
नहीं बोल पाई कोई बात,
                                 गोद में लेकर भैया को,
    उसी समय बुआ आई,
                                गोद में लेकर भैया बोले ,
    मेरी प्यारी बहना आई,
                                 बड़ा सुहाना मंजर था,
 मैं तो फूली नहीं समाई,
                               डॉ चंद्रकांता की गोद,
मैं सबसे पहले आई थी,
                   तीन दिन बाद घर की देहरी पाई थी,
बड़ा सुहाना मंजर था ,
                             बड़ा लुभावना मंजर था,
गोद में सभी उठा रहे थे,
                              मेरी आंखों में झांक रहे थे।
पिंकी पिंकी पुकार रहे थे ,
                              तब जानी मै मेरा पिंकी नाम।
पापा का बिजनेस दौड़ा,
                               सब बोले घर लक्ष्मी आई।
 पापा ने मुझे गोद उठाया ,
                                 बोले घर में लक्ष्मी आई।
 मोहनी मुस्कुराहट से मैंने ,
                                जीत लिया था सब का दिल,
थोड़ी-थोड़ी जब बड़ी हुई ,
                                रिश्ते नातों की झड़ी लगी।
कोई कहलाए बुआ मासी,
                                 कोई कहे मैं हूं तेरी चाची।
जोर-जोर से ढोल बजे,
                               जिस दिन मेरी छठी मने।
सोहर के सुर घर में बोले,
                               बाहर बंदूक पटाखे बोले।
गुब्बारे का बंदर बनवाकर ,
                                रोज़ एक पापा लाते।
मुंह में मेरे आम चटाकर ,
                               दादा मुझको रोज हंसाते।
बुआ ,चाचा का पाया प्यार,
                               सभी का पाया बहुत दुलार। मौसी ,मामा का भी पाया प्यार,
                                  जब-जब गई मैं ननिहाल।
खिलौनों का घर में बन गया स्टोर,
                            सारी दुनिया में मच गया शोर। 
बस्ता लेकर भैया मेरे ,
                           रोज स्कूल चले थे जाते।
लौट स्कूल से जब घर आते ,
                               मेरे लिए घोड़ा बन जाते ।
बाज बजाकर डिब्बा घर में,
                                  सबको गाना खूब सुनाती।
गाना बजाना सब गई भूल,
                                  एक दिन मैं भी चली स्कूल।
पाइनएप्पल की बोतल मेरी ,
                                     आर्मी मैन का बैग।
ब्लू कलर की यूनिफार्म ,
                                सूज रूमाल और टाई बेल्ट।

   




Thursday, 11 February 2021

कोरोना वापस कभी ना आना,लौट चायना जाना।।

अब तक जो बाहर होता था ,
             सबके घर में अब होता है।
उलट-पुलट सा हो गया जीवन,
                  सबको घर में होना है।

बाहर पड़ गए ताले सब के ,
                 सब को घर में होना है।
डरा डरा कर रखा सबने,
                बाहर खड़ा कोरोना है।।

ऑफिस स्कूल में पड़ गए ताले, 
                  घर पर सबको होना है।
बंद हो गए सारे काम,
                घर में होता बस आराम।।

पापा ने सारे कप तोड़े ,
                मम्मी ने तो तले पकोड़े।
घर पर सबके दिन-रात 
                 बच्चों के दौड़े घोड़े।।

अटक रही थी सब की सांस,
                     जाने कितनों ने दम तोड़े।
फोन से हो रही थी बात, 
                    रिश्तो ने नए द्वार खोले।।

घूम रहे थे अपने घर में ,
                  लगा लगा कर मुंह पर मास्क।
कभी जला रहे थे दीप ,
                    कभी बजाएं थाली गिलास।।

रात दिन बस एक ही जग ,
                     कैसे हो कोरोना का अंत।
कोई देश वैक्सीन बनाओ,
                    इस कोरोना से हमें बचाओ।।

 ऐसी महामारी कभी ना आए।
वायरस चोर चाइना को वापस जाए।।

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव ____
                                                   निशि द्विवेदी

सीधे-साधे लोग , टेढ़ी-मेढ़ी चाल,

कैसे-कैसे लोग यहां पर है,    
                                है चलते कैसी चाल,
    दिखने में लगते सीधे हैं,
                                है टेढ़ी-मेढ़ी चाल,
   छल प्रपंच से भरे हुए हैं ,
                                हैं ओढ़े अपनेपन चोला,
  मिश्री जैसी बातें करते हैं, 
                                हैं मिर्ची का बम गोला,
    मन में मैल भरा हुआ है,
                                 है रंग उनका गोरा,
      पाप की भरते बोरी हैं,
                                 है शर्म नहीं उन्हें थोड़ी,
भर भर के करते चुगली हैं,
                                 है छोरा या हो छोरी,
    बीबी से झगड़ा करते हैं,
                                  है गैरों से मुस्काते,
        मां को चुप कराते हैं,
                              कहै उन को कुछ बोलो जानु,
      चंदा को कहते चंदू हैं , 
                                 है सूरज कहते भानु,

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___
                                   निशी द्विवेदी




Wednesday, 10 February 2021

छोड़ गये,तो मेरी यादों में रहोगे!

मेरी जिंदगी मुझे कहा लेकर आई है,
कितनी उदासी मेरे दिल में छाई है,

एक झलक पाने की मैंने गुहार लगाई है,
एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई है,

सोने गई हूं जहां समंदर सी गहराई है,
उदासी को ओड़ा है तन्हाई बिछाई है,

कैसी विडंबना है समझ नहीं आई है,
 ख्यालों में जब जब तुम्हारी याद आई है

दिन में चैन नहीं रातों में तन्हाई है,
यादों के गलियारे से तुम्हारी दसतक आई है,

आज दिल ने मेरे तुम्हारी चौपाल लगाई है
तुम भूल गए मुझको या तुम्हारी रुसवाई है,

थक हार कर मैंने तुम्हारी पंचायत बुलाई है,
दिल की अदालत में मुकदमा बिठाई है,

सारे इल्जाम आज तुम पर लगाई है,
निर्दोष बताकर दिल अपना अलग बैठाई है,

हारे अगर तुम यह मुकदमा तो जाने ना दूंगी,
जीत गई अगर मैं तो तुम्हें चैन से जीने न दूंगी,

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___निशि द्विवेदी

Saturday, 6 February 2021

कोई रचा दो मेरा इस सांवरे से ब्याह

आज मेरा मन बहुत उदास है,
        लगता है वक्त मुझसे नाराज है,
                  कैसे जानू मैं कि क्या बात है,

नहीं लगता है मन कहीं आज,
      दिल में बजता नहीं कोई साज,
              मन करता नहीं करूं किसी से बात,

जो अपने थे करते थे मुझसे बात,
                       आज नहीं करी मुझसे कोई बात,
जो मुस्कुराते थे एक अलग अंदाज,
                            आज कर गय मुझे नजरअंदाज,

यह बेरुखी मेरे समझ नहीं आई,
शायद उनके जीवन में मुझसे भी अच्छी कोई आई,
मिल गया है कोई और मैं समझ नहीं पाई,

जान देकर भी मैं सह लूंगी उनसे जुदाई,
फिर भी जीवन भर देती रहूंगी उन्हें दुहाई,
आश्रु मोती की माला की ना लूंगी मैं पुहाई,

जब भी मिलूंगी कुछ ना बोलूंगी,
राज दिल का कभी न खोलूंगी,
ये बात कभी ना उनको बोलूंगी,

मिल गए राह में कभी तो नजरें फेरूगी,
उनकी सारी यादों को दिल से सजोऊंगी,
हाथ की लकीरों में होगे तो फिर से पा लूंगी,

रग रग में समाए है मेरे जो कान्हा,
अलावा इनके अब नहीं किसी को पाना,

नेत्र मुदित हूं ताकि भटक ना जाऊं राह,
कोई करा दो इस सांवरे से मेरा ब्याह,


साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव___
                            साहित्यकार __निशि द्विवेदी

खोने का डर

जितनी शिद्दत तुम्हें पाने की थी                 उससे ज्यादा डर तुम्हें खोने का है बस यही है कि तुमसे लड़ती नहीं           तुम यह ना समझना कि...