Monday, 15 February 2021

विश्वकीर्ति

दोस्तों विश्वकीर्ति एक बहुत ही खूबसूरत महिला के संघर्ष की कहानी है स्नो वाइट की जैसी खूबसूरत दूध जैसे सफेद, रूप रंग और  सब कुछ दिया ईश्वर ने बस किस्मत से ही कमजोर दिया। उसके संघर्ष की कहानी
क्या होता है आगे देखते हैं_______

 मिडिल क्लास फैमिली में जीवन यापन करने वाली उर्मी शादी को पांच वर्ष हो चुके हैं एक चार साल का बेटा है दूसरा बच्चा चाहने की मंशा में डॉक्टरों से इलाज ले रही थी परंतु कुछ ना हुआ , एक दिन किसी ने कहा कि प्रदोष का व्रत करें शिव जी की कृपा से उसके घर में  बच्चा आएगा।
ऊर्मी ने व्रत रहना शुरू किया वह प्रत्येक प्रदोष को शिव जी के मंदिर जाती है पूजन करती और उनसे प्रार्थना करती उसका पुत्र सोनू भी उसके साथ जाता शिवलिंग पर जल अर्पण करता और दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हे भोलेनाथ मुझे भी एक बोलने वाला बबुआ दे दो जो मेरे हाथों में राखी बांधे और मेरे साथ खेले दादी मुझे ताने मारती है बड़वा कहती है।
भोलेनाथ तो भोले थे अबोध बालक की प्रार्थना सुन ली और उर्मी का गर्भ ठहर गया ।
 ससुराल में सभी उसको ताने मार रहे थे ज्यादा सो मत नहीं तो बेटी हो जाएगी,बाया पैर नहीं दाया पैर आगे बढ़ाओ नहीं तो बेटी हो जाएगी, बासी रोटी खाओ बच्चे के बाल बहुत अच्छे होंगे ,सभी को घर में उर्मी से यही आशा थी कि वह पुत्र को जन्म दे । उर्मि हर बात को हंसी में टाल देती ,नव महीने गर्भ से है ,ससुराल में सास ननंद उस दिन का इंतजार कर रही हैं ।
धीरे-धीरे दिन करीब आ रहे थे उर्मि को दर्द हो रहा था हॉस्पिटल गई और एक लड़की का जन्म होता है।
डॉक्टर चंद्रकांता( बहुत सुंदर थी उन्हें सुंदरता का खिताब भी मिल चुका था मिस इंडिया रह चुकी थी) प्रसूति उन्हीं के हाथों से होती है,बहुत खूबसूरत परियों सी सुंदर बच्ची को हाथ में लेते हुए उनके मुंह से यकायक निकल गया, लक्ष्मी आई है यह बच्ची विश्व में नाम करेगी इसकी कीर्ति चारों दिशाओं में रोशनी की तरह फैलेगी इसका नाम विश्वकीर्ति रखना।
बेटी के जन्म से मां-बाप और पूरे परिवार में एक गम का माहौल सा छा गया ,सभी लोगों ने माथा ठोका बेटी के जन्म से दहेज की चिंता होने लगती है।
लेकिन उस नवजात शिशु के मन पर क्या बीत रही  उसके कदम रखते ही घर में गम का माहौल सा छा गया।
नर्स बच्चे को लेकर उर्मी की सास के पास जाती है और कहती है लक्ष्मी आई है नेक दो।
सासू झुललाकर कहती है लक्ष्मी है तो तुम ही रख लो , बेटा होता तो देती बेटी है क्या दूं मैं तुझे और क्या रखूं इसके दहेज के लिए तू यहां से जा और इसे भी ले जा!
 कदम बढ़ाते हुए वापस अपने घर आ जाती है ंं
नर्स बच्चे को लेकर पिता के पास जाती है कहती है लक्ष्मी आई है खुशहाली के रूप में कुछ पैसे दीजिए,
पिता माथा ठोकते हुए कहते हैं क्या खुशी क्या गम मैं क्या दूं समझ नहीं आता बेटी का बोझ में कैसे उठा पाऊंगा ।सर झुकाना पड़ेगा, दूसरों के द्वार जाना पड़ेगा ,पाव छूने पड़ेंगे ,गिड़गिड़ाना पड़ेगा, नाक रगड़ना पड़ेगा
जीवन भर की कमाई तो देनी ही पड़ेगी साथ में सुख दुख में परेशान होना पड़ेगा सुख मिला तो ठीक और दुख मिला तो जी नहीं पाऊंगा समझ नहीं आता क्या होगा।
पिता को दुखी देखकर नर्स वापस आ गई कुछ बिना बोले क्या बोल सकती थी वह भी परेशान हो गई।
नवजात शिशु के ह्रदयपटल पर इन सब बातों का बहुत बुरा असर पड़ रहा था नर्स ने बच्चे की ओर देखा आंखें खोल कर सब सुन रही थी नर्स ने बड़े प्यार से उसकी ओर देखा बच्ची पर हाथ फेरते हुए दुखी हो गई। ‌
बच्ची ने अपनी आंखें बंद कर ली ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह मन ही मन ईश्वर से वार्तालाप कर रही है।
हे ईश्वर ये मुझे कहां भेज दिया जहां धन का इतना अभाव है वहां आपने और तकलीफ बढ़ा दी ।्
उर्मी बच्चे के साथ तीन दिनों तक हॉस्पिटल में रहती है
सभी बस मजबूरी बस उससे मिलने जाते हैं किसी के चेहरे पर खुशी नहीं थी केवल डॉक्टर दीदी बड़ी खुशी खुशी आती थी बच्ची को खिलाती थी हालचाल पूछती थी और चली जाती थी उनके छूने से बच्चे को खुशी मिलती थी। आज उर्मी का बेटा सोनू अपनी बुआ की गोद में आता है अपनी बहन को देखकर खुशी से उछल पड़ता है नर्स उसे उछलते खेलते देखकर खुश होती है और पूछती है, यह बेबी कौन है तुम्हारा.....?.
सोनू से पकड़ते हुए जवाब देता है..... !!!!मेरी बहन है ,भोलेनाथ ने दिया है ,मैंने उनसे मांगा थ !!
नर्स ने सामने लेटी दूसरी महिला की ओर इशारा करते हुए कहा यह बेबी मुझको दे दो वह वाला बेबी तुम लोगे?
वह बेटा है जब तुम बड़े हो जाओगे तुम्हारे साथ खेलेगा तुम्हारे साथ पढ़ने जाएगा ,यह बहन हमको दे दो !!!!तुम्हारे साथ नहीं खेल पाएगी बहुत छोटी है;
तभी सोनू ने तपाक से जवाब दिया नहीं वह बबुआ तो काला काला है, मेरी बहन गोरी गोरी है मैं नहीं बदलूंगा अपनी बुआ से कहता है इसको बैग में रखकर अपने घर ले चलो नहीं तो कोई ले लेगा। यह बड़ी मुश्किल से मुझे मिली है मैंने मांगी है।
नर्स .....  नहीं अभी तुम इसे अपने घर नहीं ले जा सकते अभी इसको इंजेक्शन लगना है और डॉक्टर ने भी ले जाने से मना किया है। 
सोनू....._तो मैं भी यहीं रहूंगा ताकि कोई से चुरा ना ले जाए।
(उन दोनों की खींचातानी को देखकर सभी खुश हो रहे थे बस 3 दिनों बाद हॉस्पिटल से छुट्टी होती है सोनू अपनी बहन को लेकर भाग जाता है और बहुत खुश होता है बच्चे की खुशी देखकर सभी खुश थे घर में किलकारियां गूंज रही थी छोटे बच्चे की रोने की आवाज आ रही थी बच्चे की रोने की आवाज से आंगन गूंज उठा था)
मन दुखी था लेकिन सारे रीति रिवाज चल रहे थे वह खुशी ना थी जो सोनू के पैदा होने पर हुई थी।
बच्ची दिनों दिन बढ़ती जा रही थी और घर में लक्ष्मी भी बढ़ती जा रही थी पिता के कारोबार में तो तरक्की होने लगी थी सभी कह रहे थे बेटियां अपने भाग्य का लेकर आती हैं।
तभी अचानक एक आदमी आता है उर्मी के पति के हाथों में एक लिफाफा थमाते हुए कहता है__
भाई यह लो तुम्हारे ₹पाच हजार मुझे अचानक पैसे की जरूरत पड़ गई थी मैं तुमसे कर्ज लेकर अपने गांव चला गया था। मेरी मां बहुत बीमार थी अब वह ठीक है मैं गांव से वापस आ गया हूं कुछ बचे हुए पैसे हैं जो मैं तुम्हें वापस कर रहा हूं अपनी अमानत संभाले ।
उर्मी का पति__ क्या भाई ऐसा भी कोई करता है मैंने माल लेने के लिए पैसे आपको दिए थे आपने माल भी नहीं पहुंचाया और पैसे भी नहीं दिए आप समझ नहीं सकते हम इतने दिनों से कितनी तकलीफ उठा रहे थे। मुझे कहीं से माल नहीं मिला पत्नी भी हॉस्पिटल में एडमिट हो गई इलाज के लिए पैसे ब्याज पर लेने पड़े मुझे अरे कम से कम जाने से पहले बता तो देते मैं नहीं था तो दुकान के आसपास लोगों को बता देते संदेश तो पहुंचा देते हैं ऐसा कोई करता है।
  शर्मिंदा होकर क्षमा मांगता और वापस चला जाता है।
सभी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है खोया हुआ पैसा एकदम से मिल जाए यह तो वही बात हो गई की भगवान देता है तो छप्पर फाड़कर देता है।
तभी उर्मी अपने पति से कहती है कि देखिए हमारी बेटी कितनी भागयशाली है आते ही उसने आपके पैसे को वापस दिलवा दिया इससे बड़ा और क्या सबूत हो सकता है की बेटियां लक्ष्मी का रुप होती हैं।
आंख में आंसू भर कर अपनी बेटी को गोद में लेकर उस पैसे के ऊपर अपनी बेटी को लिटाते हुए उर्मी का पति कहता है मेरी बेटी लक्ष्मी का रूप नहीं साक्षात लक्ष्मी है अब वह इसी लक्ष्मी पर लेटेगी। आज उसकी छट्टी है और यह खोया हुआ पैसा सारा इसका है मैं इसे बैंक में जमा कर दूंगा यह पैसा मेरी बेटी की शादी में काम आएगा।

बेटी चंद्रमा की कला की तरह धीरे-धीरे बढ़ने लगती है और जितनी बड़ी होती है उतनी ही खूबसूरत होती है उसके रूप रंग को देखकर सभी अचंभित हो जाते हैं और कहते हैं यह डॉक्टर चंद्रकांता के हाथों का असर है उनके हाथों से जन्म लिया है बहुत सुंदर बेटी है। लोगों की बातों को काटते हुए उर्मी की सांस कहती है खूबसूरत बेटी से अच्छा बदसूरत बेटा होता है होता तो आखिर बेटा ही होता है बेटी किस काम की घर खालीकर चली जाती है।
कुर्मी का पति अपनी मां को चुप कराते हुए कहता है__
अम्मा अब बस भी करो मेरी बेटी बहुत नाम कमाए गी मैं उसे डॉक्टर बनाऊंगा आंखिर डॉक्टर चंद्रकांता भी तो एक महिला ही है वह भी तो किसी की बेटी है। हंसते हुए कहता है___तुम भी तो किसी की बेटी हो अगर तुम ना होती तो हम सब लोग कहां से होते हैं माना कि बेटा वंश चलाता है लेकिन उस वंश को जन्म देने के लिए तो बेटियां ही होती हैं।




आज तुम्हारी चिट्ठी आई

आज तुम्हारी चिट्ठी आई,
पिया मिलन की याद दिलाई
भूल गई मैं ऋतुएं सारी,
 बड़े जोर से मैं मुस्काई,

तुम बिन बदरंग जिंदगी
 सावन से बसंत ऋतु आई,
आंखों में वर्षा,
 उमंगों में पतझड़, 
होली भी बेरंग, 
और दिवाली पर दिल जलाए,

आज तुम्हारी चिट्ठी आई,
 लिखा नहीं कहीं पर भी था,
वापस कब तुम आओगे,
सूने मेरे घर आंगन को ,
कब-तक तुम महकाओगे,

आज तुम्हारी चिट्ठी आई,
खुशियों की सौगात है लाई,
जब से गए परदेस को साजन,
सूना पड़ा है घर और आंगन,
अब तो लौट आओ मेरे साजन,

आज तुम्हारी चिट्ठी आई ,
चंदन की खुशबू लाई,
क्या करोगे इतना धन,
 सूना पड़ा मेरा जीवन,
तुम बिन अब रहा न जाए,

 अबकी करो कुछ ऐसा वादा ,
कि अगले सावन साथ ही खेले,
 ऐसा ना हो कि बिना तुम्हारे ,
सावन मेरी जान ही ले ले,

विश्व साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव _____                                 निशि द्विवेदी

Saturday, 13 February 2021

बचपन की यादें करो तुम ताजा

बेटी बनकर जन्मी हूं,
                             बेटी को ना जीवन देना चाहूंगी।
जो दिन जीवन में अपने देखें,
                             बेटी के जीवन में ना चाहूंगी।
सुना था पापा रो पड़े थे,
                               मेरा जन्म सुनने के बाद।
सब ने माथा ठोका था ,
                               मेरा जन्म होने के बाद।
मां को भी था देखा उदास  ,
                            बेटा होता तो बधाई मिलती ,
  नर्स भी बैठी थी उदास,
                               बड़ा रूआना मंजर था,
      सभी बैठे थे उदास,
                               टुकुर-टुकुर मैं देख रही थी ,
नहीं बोल पाई कोई बात,
                                 गोद में लेकर भैया को,
    उसी समय बुआ आई,
                                गोद में लेकर भैया बोले ,
    मेरी प्यारी बहना आई,
                                 बड़ा सुहाना मंजर था,
 मैं तो फूली नहीं समाई,
                               डॉ चंद्रकांता की गोद,
मैं सबसे पहले आई थी,
                   तीन दिन बाद घर की देहरी पाई थी,
बड़ा सुहाना मंजर था ,
                             बड़ा लुभावना मंजर था,
गोद में सभी उठा रहे थे,
                              मेरी आंखों में झांक रहे थे।
पिंकी पिंकी पुकार रहे थे ,
                              तब जानी मै मेरा पिंकी नाम।
पापा का बिजनेस दौड़ा,
                               सब बोले घर लक्ष्मी आई।
 पापा ने मुझे गोद उठाया ,
                                 बोले घर में लक्ष्मी आई।
 मोहनी मुस्कुराहट से मैंने ,
                                जीत लिया था सब का दिल,
थोड़ी-थोड़ी जब बड़ी हुई ,
                                रिश्ते नातों की झड़ी लगी।
कोई कहलाए बुआ मासी,
                                 कोई कहे मैं हूं तेरी चाची।
जोर-जोर से ढोल बजे,
                               जिस दिन मेरी छठी मने।
सोहर के सुर घर में बोले,
                               बाहर बंदूक पटाखे बोले।
गुब्बारे का बंदर बनवाकर ,
                                रोज़ एक पापा लाते।
मुंह में मेरे आम चटाकर ,
                               दादा मुझको रोज हंसाते।
बुआ ,चाचा का पाया प्यार,
                               सभी का पाया बहुत दुलार। मौसी ,मामा का भी पाया प्यार,
                                  जब-जब गई मैं ननिहाल।
खिलौनों का घर में बन गया स्टोर,
                            सारी दुनिया में मच गया शोर। 
बस्ता लेकर भैया मेरे ,
                           रोज स्कूल चले थे जाते।
लौट स्कूल से जब घर आते ,
                               मेरे लिए घोड़ा बन जाते ।
बाज बजाकर डिब्बा घर में,
                                  सबको गाना खूब सुनाती।
गाना बजाना सब गई भूल,
                                  एक दिन मैं भी चली स्कूल।
पाइनएप्पल की बोतल मेरी ,
                                     आर्मी मैन का बैग।
ब्लू कलर की यूनिफार्म ,
                                सूज रूमाल और टाई बेल्ट।

   




Thursday, 11 February 2021

कोरोना वापस कभी ना आना,लौट चायना जाना।।

अब तक जो बाहर होता था ,
             सबके घर में अब होता है।
उलट-पुलट सा हो गया जीवन,
                  सबको घर में होना है।

बाहर पड़ गए ताले सब के ,
                 सब को घर में होना है।
डरा डरा कर रखा सबने,
                बाहर खड़ा कोरोना है।।

ऑफिस स्कूल में पड़ गए ताले, 
                  घर पर सबको होना है।
बंद हो गए सारे काम,
                घर में होता बस आराम।।

पापा ने सारे कप तोड़े ,
                मम्मी ने तो तले पकोड़े।
घर पर सबके दिन-रात 
                 बच्चों के दौड़े घोड़े।।

अटक रही थी सब की सांस,
                     जाने कितनों ने दम तोड़े।
फोन से हो रही थी बात, 
                    रिश्तो ने नए द्वार खोले।।

घूम रहे थे अपने घर में ,
                  लगा लगा कर मुंह पर मास्क।
कभी जला रहे थे दीप ,
                    कभी बजाएं थाली गिलास।।

रात दिन बस एक ही जग ,
                     कैसे हो कोरोना का अंत।
कोई देश वैक्सीन बनाओ,
                    इस कोरोना से हमें बचाओ।।

 ऐसी महामारी कभी ना आए।
वायरस चोर चाइना को वापस जाए।।

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव ____
                                                   निशि द्विवेदी

सीधे-साधे लोग , टेढ़ी-मेढ़ी चाल,

कैसे-कैसे लोग यहां पर है,    
                                है चलते कैसी चाल,
    दिखने में लगते सीधे हैं,
                                है टेढ़ी-मेढ़ी चाल,
   छल प्रपंच से भरे हुए हैं ,
                                हैं ओढ़े अपनेपन चोला,
  मिश्री जैसी बातें करते हैं, 
                                हैं मिर्ची का बम गोला,
    मन में मैल भरा हुआ है,
                                 है रंग उनका गोरा,
      पाप की भरते बोरी हैं,
                                 है शर्म नहीं उन्हें थोड़ी,
भर भर के करते चुगली हैं,
                                 है छोरा या हो छोरी,
    बीबी से झगड़ा करते हैं,
                                  है गैरों से मुस्काते,
        मां को चुप कराते हैं,
                              कहै उन को कुछ बोलो जानु,
      चंदा को कहते चंदू हैं , 
                                 है सूरज कहते भानु,

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___
                                   निशी द्विवेदी




Wednesday, 10 February 2021

छोड़ गये,तो मेरी यादों में रहोगे!

मेरी जिंदगी मुझे कहा लेकर आई है,
कितनी उदासी मेरे दिल में छाई है,

एक झलक पाने की मैंने गुहार लगाई है,
एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई है,

सोने गई हूं जहां समंदर सी गहराई है,
उदासी को ओड़ा है तन्हाई बिछाई है,

कैसी विडंबना है समझ नहीं आई है,
 ख्यालों में जब जब तुम्हारी याद आई है

दिन में चैन नहीं रातों में तन्हाई है,
यादों के गलियारे से तुम्हारी दसतक आई है,

आज दिल ने मेरे तुम्हारी चौपाल लगाई है
तुम भूल गए मुझको या तुम्हारी रुसवाई है,

थक हार कर मैंने तुम्हारी पंचायत बुलाई है,
दिल की अदालत में मुकदमा बिठाई है,

सारे इल्जाम आज तुम पर लगाई है,
निर्दोष बताकर दिल अपना अलग बैठाई है,

हारे अगर तुम यह मुकदमा तो जाने ना दूंगी,
जीत गई अगर मैं तो तुम्हें चैन से जीने न दूंगी,

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___निशि द्विवेदी

Saturday, 6 February 2021

कोई रचा दो मेरा इस सांवरे से ब्याह

आज मेरा मन बहुत उदास है,
        लगता है वक्त मुझसे नाराज है,
                  कैसे जानू मैं कि क्या बात है,

नहीं लगता है मन कहीं आज,
      दिल में बजता नहीं कोई साज,
              मन करता नहीं करूं किसी से बात,

जो अपने थे करते थे मुझसे बात,
                       आज नहीं करी मुझसे कोई बात,
जो मुस्कुराते थे एक अलग अंदाज,
                            आज कर गय मुझे नजरअंदाज,

यह बेरुखी मेरे समझ नहीं आई,
शायद उनके जीवन में मुझसे भी अच्छी कोई आई,
मिल गया है कोई और मैं समझ नहीं पाई,

जान देकर भी मैं सह लूंगी उनसे जुदाई,
फिर भी जीवन भर देती रहूंगी उन्हें दुहाई,
आश्रु मोती की माला की ना लूंगी मैं पुहाई,

जब भी मिलूंगी कुछ ना बोलूंगी,
राज दिल का कभी न खोलूंगी,
ये बात कभी ना उनको बोलूंगी,

मिल गए राह में कभी तो नजरें फेरूगी,
उनकी सारी यादों को दिल से सजोऊंगी,
हाथ की लकीरों में होगे तो फिर से पा लूंगी,

रग रग में समाए है मेरे जो कान्हा,
अलावा इनके अब नहीं किसी को पाना,

नेत्र मुदित हूं ताकि भटक ना जाऊं राह,
कोई करा दो इस सांवरे से मेरा ब्याह,


साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव___
                            साहित्यकार __निशि द्विवेदी

Wednesday, 27 January 2021

तेरे चरणों की मैं हूं दासी, तुम बिन रहा उदासी


तेरे रूप बड़ौ अनमोल,
देखने में लागे तनिक न मोल,

कलेजे में ठंडक पड़ जाए ,
जो तू दर्शन देने आए,

तेरी बंसी मैं बन जाऊं,
 तुम्हारे अधरन से लग जाऊं,

तेरी मुंदरी बन कर कान्हा,
 तेरी उंगली में बस जाऊं,

तेरे साथ ही बस जाऊं ,
तुझसे दूर रह ना पाऊं,

तुमरे नैनन में बस जाऊं ,
या फिर तुम्हें नयन बसाऊं,

तुमरे चरणों में बस जाऊं ,
मुख से तुम्हारे भजन में गांऊ,

राधे मेरे श्याम मेरे राधे राधे श्याम,
जय जय राधे राधे श्याम जय जय राधे राधे श्याम

साहित्य सेवा संस्थान,
 अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___निशी द्विवेदी

फेरा है चौरासी लाख योनियों का , फिर भी.....

जो आज नया है मित्रों, एक दिन तो पुराना होना है, 
जन्म लिया है आज, एक दिन तो मृत उसे होना है,

मेला है कुम्भ का, एक दिन तो सभी को बिछड़ना है,
ठेला है बस सांसों का, एक दिन तो खड़ा होना है,

चेला है आत्मा , परमात्मारूपी गुरु का उसे होना है,
रेला है रैन बसेरा है, सुबह तलक यहां होना है,

डेरा है कुछ समय का, अब कूच यहां से करना है,
धेला है जिसके पीछे इनसान पड़ा अकेला है,

फेरा है चौरासी का, फिर भी पता सभी को रहता है,
बेरा है किस्मत का , इससे सेवा का मेवा मिलता है,
 साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव
साहित्यकार _____निशि द्विवेदी

Tuesday, 29 December 2020

निशी कृष्ण नैनों में रहना और कहीं तुम ना जाना

राधा तो मेरी सौतन लागे,
सांवरो तो बस मेरो है,

अखियांन मेरी श्याम बसे हैं,
जीभया मेरी श्याम रटे है,

दर्पण देखे राधा रानी,
मृरग नयनी है राधा रानी,

मेरे नयन में बसे बिहारी,
निशि कृष्ण नयन बसाया,

भूल गई सब सुध बुध माया,




 साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव __ निशि द्विवेदी

Saturday, 26 December 2020

निगाहों में तुम हो



लगा कर रख सकूं कलेजे से तुमको मेरी कहां औकात है।
बसाकर नयन छुपाऊं जग से तुमको, मेरी कहां मजाल?
सजा सकु मैं रोम रोम अपना, तुम सा!
बात कुछ खास नहीं,
दिखा दे एक झलक तू अपना,
फिर तो मुझे मौत भी स्वीकार है,
बना लो मुझे अपनी बंसी की धुन,
इस संसार से हो जाऊं मैं गुम,
देख कर तुमको मैं नैन मुदित हो जाऊंगी,
तुम बिन नहीं कहीं चैन अब पाऊंगी,

                  स्वरचित रचनाकार __ निशि द्विवेदी

Wednesday, 2 December 2020

तुमको ना भूल पाएंगे

तुमको ना भूल पाएंगे पापा जी,
तुमको ना भूल पाएंगे,
ना भूले थे हम कभी आपको, 
और ना कभी भुलाएंगे आपको,
आपके चरणों में दो फूल,
 श्रद्धांजलि के हर वर्ष चढ़ाएंगे,
अपनी यादों में आपको हमेशा बसाएंगे,
अपनी बातों में जिक्र आपका हमेशा चाहेंगे,
तुमको ना भूल पाएंगे पापाजी,
 तुमको ना भूल पाएंगे,
ना भूले थे कभी आपको ,
और ना भुला पाएंगे,
तुम्हारी कर्मठता को,
 अपने बच्चों को सिखाएंगे,
आप जैसा काबिल अपने बच्चों को बनाएंगे,
जो दिया है आपने कभी नहीं भूल पाएंगे,
आपकी तस्वीर के आगे सदा दिया जलाएंगे,
किस दुनिया में गए हो आप ,
ढुढ तो नहीं पाएंगे,
भावनाओं रूपी फूल ,
उस दुनिया तक पहुंच जाएंगे,
मुझे याद है वह दिन ,
जब आप अपने घर में,
 मुझे बहू बना कर लाए थे,
मेरे पापा बन कर सदा मेरा साथ निभाए थे,
आज भी घर में जब ,कटु वचन कोई कहता है,
आपकी तस्वीर से मुझे वही सहारा मिलता है,
तुमको ना भूल पाएंगे ,
पापा जो तुमको ना भूल पाएंगे,
जिस दुनिया में गए हो आप ,
 वहां कोई आपको हमसे ज्यादा प्यारा है,
आपकी आंखें तो हमें देखती होंगी,
 हमें तो बस आपके सपनों का सहारा है,


साहित्यकार ,निशि द्विवेदी

Monday, 2 November 2020

मैं चंदा देखन जाऊं ,या नयन सुख पाओ।।

इतना सज धज खड़े हैं,
 कान्हा कुछ कहने की नहीं कोई बात है,

करवा चौथ का व्रत करें है मेरी राधा,
बहुत खुशी की यह तो बात है,

छलनी दीपक धारे है मेरी राधा,
एकटक निहारे हैं राधा,

बंसी अधरन लगाए हैं कान्हा,
वह तो सुबह से नहीं कुछ खाए हैं,

उतना ही सज धज खड़ी है मेरी राधा,
कुछ कहने की नहीं कोई बात है,

रूप देख मेरे मोहन को,
आज चंदा ने भी सुर्ख लाल रंग पाए हैं,

आज देख सभी चंदा को ,
फिर देख रहे मोहन को,

 अटरा पर अपने अपने पति को,
 छोड़ गोपयन भी भाग भाग आई हैं,

लगाए टुकटुकी निहारे बस कान्हा,
वह तो नैनो का सुख रही पाए हैं,

अति आनंद लूट रहे हो जग में,
मेरे कान्हा पर सब लुढ लुढ जाए हैं,

आनंद ही आनंद भयो ब्रज में,
मेरे नयन भी अति आनंद को पाए हैं,

छवि सबसे निराली मेरे श्याम की,
निशि नयन में कृष्ण को बसाए हैं,

जय जय राधे राधे मेरे श्याम जी,
 जय जय मुरली वाले घनश्याम जी ,

मेरे नैनों में ही बस कर रहना,
और कहीं तुम ना जाना,

साहित्य सेवा संस्थान
सचिव__ _____ निशि द्विवेदी

Sunday, 1 November 2020

तेरे चरणों की मैं हूं दासी, तुम बिन रहा उदासी


तेरे रूप बड़ौ अनमोल,
देखने में लागे तनिक न मोल,

कलेजे में ठंडक पड़ जाए ,
जो तू दर्शन देने आए,

तेरी बंसी मैं बन जाऊं,
 तुम्हारे अधरन से लग जाऊं,

तेरी मुंदरी बन कर कान्हा,
 तेरी उंगली में बस जाऊं,

तेरे साथ ही बस जाऊं ,
तुझसे दूर रह ना पाऊं,

तुमरे नैनन में बस जाऊं ,
या फिर तुम्हें नयन बसाऊं,

तुमरे चरणों में बस जाऊं ,
मुख से तुम्हारे भजन में गांऊ,

राधे मेरे श्याम मेरे राधे राधे श्याम,
जय जय राधे राधे श्याम जय जय राधे राधे श्याम

साहित्य सेवा संस्थान,
 अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___निशी द्विवेदी

मुझसे ब्याह रचा लै,

राधाा मुझसे ब्याह रचाा लो
मुझे अपना पति बना लो,

सब मेरी हंसी उड़ावै,
 मुझको बहुत ही लज्जा आवे,

मेरी बूढ़ी हो गई माई ,
मुझको अब सबर होए नाई।

ग्वाल बाल संग आऊं,
और तुम्हें ब्याह ले जाऊं।

तुम रे माखन जैसे हाथ,
 तुम्हारे हाथ मै माखन खाऊ,

तो मुझको प्यारी लागे,
 तुमसे काम न कराऊं,

पानी भी मैं भरकर लाऊं ,
और गांवयै में ही चराऊ,

बस तुम मेरे घर में आजा,
तेरौ रूप मोहै है भाता,


साहित्य सेवा संस्थान 
अंतर्राष्ट्रीय सचिव ___निशि त्रिवेदी


मुख से निकले शब्द, तौल के बोलो।

तुम्हारे मुख से,
 निकले शब्दों को सुनकर,
 खून मेरा खौला था,

क्या उन शब्दों को तुमने ,
मन के तराजू में ,
तौल कर बोला था,

हे कन्हैया ,
कितने कड़वे थे वह शब्द,
क्या उन शब्दों को तुमने ,
चख कर बोला था?

कहां से लाए थे यह शब्द,
शब्दकोश को पूरा निचोड़ा था,
या फिर तुम्हारे मन में ,
शब्दकोश का पोटला था,

जिस पर चलाए थे ,
तुमने शब्दों के बाण,
उसका मन बहुत भोला था,

क्या तुम्हारे ,
तरकस में ,
विश् का कटोरा था,

क्यों दुखाया तुमने ,
उसका ह्रदय,
उसके हृदय में भी तो ,
राम का बसेरा था,

जब तुम्हारे शब्दों के दंश ने,
 उसके हृदय पर आघात ,
किया होगा,

उसका हृदय भी तो,
 बिलख बिलख कर 
रोया होगा,

क्यों करता है एक मानव,
 दूसरे मनुष्य पर ऐसा वार,
जबकि सब जानते हैं कि,
 हर मनुष्य में है ईश्वर का वास,

जब कोई करता होगा ,
तुमसे मीठी बात,
तुम्हारा हृदय ,
 हिंडोले लेता होगा,

साहित्य सेवा संस्थान अंतर्राष्ट्रीय सचिव  
____निशि  दि्वेदी

Tuesday, 27 October 2020

मुझको लगती है बस तेरी बातें प्यारी,

मीठी-मीठी सी याद तुम्हारी आती,
 प्यारी प्यारी सी याद तुम्हारी आती,

 तेरी बंसी की धुन में मैं राम जाती,
तेरी बंसी तो मुझको पागल कर जाती,

तुम्हारी आंखों में मैं खो जाना चाहती,
तेरे चरणों में थोड़ी जगह हूं चाहती,

मैं तो तेरी ही तेरी रहना चाहती,
सांवरे मालिक तुम मैं हूं तुम्हारी दासी,

हर एक चीजों से तुम्हारी अल्पना बनाती,
तेजपत्ता और सौंफ जीरा इलायची,

मिर्ची दालचीनी और बड़ी इलायची,
 तेरे आगे मैं रोज दिया  जगाती,

दीवाली भी तेरी, मैं भी तुम्हारी होली,
कान्हा भर दो ना भर दो मेरी झोली,

निशदिन तेरी ही बस तेरी बातें पाती,
 रोज सवेरे उठकर तेरे गुणगान गाती,

साहित्यकार का नाम___ निशि द्विवेदी

Friday, 16 October 2020

हास्य कलाकार पिंकू दि्वेदी

हंसते हैं,
 हंसाते हैं,
 नाम अपना,
 पंडित जी बताते हैं,
फेसबुक में भी आते हैं
नय नय पोस्ट लगाते हैं,

हंसते हैं ,
बहुत हंसाते हैं,
 यूट्यूब में भी आते हैं,
दुखा दुखा कर पेट हंसाते हैं,
नाम अपना पिंकू द्विवेदी बताते हैं,

खुश रहते ,
 खुशी बढ़ाते हैं,
कानपुर में रहते हैं,
 उन्नाव ग्राम बेहतर बताते हैं,
बिजनेसमैन है टॉप क्लास के,
दिलों में सबके घर बनाते हैं,

सभी वर्गों के प्यारे हैं,
बच्चों की तो जान है वह,
जवानों की भैया कहलाते हैं,
बुढो में भी रम जाते हैं,

देशवासियों की जान हैं पिकू भैया,
हमारे देश की शान है पिंकू भैया,
सबके प्यारे पिकू भैया,
सब कहते हैं पिंकू भैया,

             साहित्यकार ____निशि द्विवेदी


Sunday, 11 October 2020

बस तुम साथ होते।

मैंने कब चाहा था कि,
                           सारा चमन हमारा हो,
तुम चार पंखुड़ी फूलों की,
                             मेरे ऊपर से गिरा देते।
मैंने कब मांगा था तुमसे,
                               ज्वेलरी सोने की,
तुम एक फूल ही हंसकर,
                             मेरे बालों में लगा देते।
मैंने कब मांगी थी तुमसे ,
                                शिमला सी ठंडक,
साथ बैठकर मेरे संग तुम, 
                           पूनम का चांद निहार लेते।
मैंने कब बोला था तुमसे ,
                          दौलत का अंबार लगा दो,
तुम साथ बैठकर मेरे,
                        गीत जुगलबंदी के गा लेते।
मैंने तो बस चाहा था,
                      मेरे हाथ में हाथ तुम्हारा हो,
साथ बैठकर हमने,
                        जो भी कसमें खाई थी,
तुम सब कुछ ही भुला बैठे ,
                             मैं तो भूल ना पाऊंगी।
मैंने कहा सोचा था,
                       तुम से बिछड़ कर जीने की,
तुम एक बार चले आते ,
                            हम सब कुछ भुला देते। 
मैंने कब मांगा था तुमसे ,
                           घर आंगन और गलियां हो,
साथ होते तो हम तुम ,
                         एक आशियाना बना लेते।
                 साहित्यकार____ निशि द्विवेदी

Friday, 9 October 2020

पैसे से ही रिश्ता कैसा?

पैसा पैसा पैसा*****
 हाय पैसा पैसा******
 पैसे के लिए ही """"
ईमान धर्म है बिकता ....
पैसे से है यारी........
 पैसे से है रिश्ता...........
पैसे से ही होता ...
रिश्तो का सौदा......
पैसा पैसा पैसा हाय पैसा पैसा....
पैसा पैसा पैसा वाह रे पैसा पैसा!!!!!!!

चंद कागज़ के टुकड़े .....
और सिक्कों की खनक में .....
लोग बौराय जाते.....
अच्छे लोग भुलाए जाते...
पैसा पैसा पैसा...
 वाह रे पैसा पैसा.......
पैसा पैसा पैसा...
 हाय पैसा पैसा.....

भावनाओं के परिंदे...
 बस धरा पर रेंगते....
पैसे की चमक में ....
लोग अंधे हो जाते ...
पैसों की चमक में...
 बिना पंख के उड़ जाते...

वाह रे पैसा पैसा ....
वाह रे पैसा पैसा!!!!!!
पैसे के लिए ही मां-बाप भुलाए जाते...

 पैसे के लिए ही ...
जाने कितने दिल तोड़े जाते.....
दूर दूर के रिश्ते पैसे से जोड़े जाते ...
और करीब के रिश्ते पैसे के लिए तोड़े जाते...

पैसा पैसा पैसा वाह रे पैसा पैसा...
कैसा कैसा कैसा पैसे से रिश्ता कैसा....
सब को यह पता है ....
फिर भी भूल जाते .....
खाली हाथ आए थे,,,,,
 खाली हाथ ही जाते.....

कैसा कैसा कैसा पैसे से रिश्ता कैसा....
 बस जीते जी का रिश्ता.... 
गिर जाते हैं नीचे ......
कुछ सिक्को के लिए...
हजारों को दुनिया से उठा देते,,,
बस कुछ सिखों के लिए,,,,,,

ऐसा ऐसा ऐसा ....
ऐसा क्यों है होता ,,,,
जन्म की नौछावर से,,,
 अंत तक बस पैसा,,,
 पैसा पैसा पैसा हाय पैसा पैसा,,,,,,,
 पैसा पैसा पैसा पैसे से ही रिश्ता

            साहित्यकार ___ निशि द्विवेदी

Monday, 5 October 2020

शरारत खो गई है कहीं चलो मिलकर ढूंढो,

शरारत की ही नहीं मैंने,
 मुझसे हो गई है,
बचपन में होती थी ,
अब कहीं खो गई है,
चलो मिलकर ढूंढो,
लगता है कहीं सो रही है,
 शरारत कर जिस आंचल में छुप जाती थी,
जाकर मां के आंचल में ढूंढी,
 नहीं मिली,
सखियों से बोला मेरी शरारत कहीं खो गई है,
वह बोली बाद में बात करना अभी मैं व्यस्त हूं,
बच्चों से पूछा मेरी शरारत कहां गई है,
वह बोले तेरी तो पता नहीं ,
मेरी तो बसते के नीचे दबी पड़ी है,
पड़ोसी को बोला मेरी शरारत कहीं चली गई है,
वह बोले बाद में बात करेंगे अभी समय नहीं है,
थाने गई मैं रपट लिखाने,
मैं बोली मेरी शरारत मिल नहीं रही है,
दरोगा बोले क्या क्या साथ लेकर गई है ,
मैं बोली जब से शरारत गई है,
 मेरी हंसी को साथ ले गई है,
 खुशी भी कहीं मिल नहीं रही है,
उदासी मेरे घर में बिखरी पड़ी है,
वह बोले रिश्तेदारों को फोन करके पूछो,
उनके घर तो नहीं चली गई है,
मैं बोली ना उनकी भी जिम्मेदारियों में दबी पड़ी है,
सब के फोन आ रहे हैं मेरे पास बारी-बारी ,
उनकी भी कहीं खो गई है, कहीं चली गई है,
वह बोले 24 घंटे ढूंढ लो, मिल जाए तो बता देना,
मैं उदास आंखों से ढूंढ रही थी,
मेरी शरारत मुझे कहीं नहीं मिल रही थी,
उदासी की चादर ओढ़ के जब मैं घर आई,
मुझे थोड़ी उबासी आई,
बस थोड़ी पलक झपकाए
अगले ही पल मेरी आंखें पति से जा टकराई,
हमारी नजरें आपस में टकराई,
चेहरे पर मुस्कुराहट आई,
मैंने मेरी मुस्कुराहट वापस पाई,
फिर जो हुआ बस कहना क्या था,
उनकी आंखों में शरारत ने डेरा डाला था,
एक फूल मेरी ओर शरारत से फेंका,
बस फिर क्या था मैंने भी पूरा गुलदस्ता ,
उन पर दे मारा,
और अपनी शरारत को वापस पाया,
 मैं भाग रही थी आगे आगे,
और पूरा घर मेरे पीछे पीछे ,
बच्चे भी संग भाग रहे थे ,
सब मिलकर पकड़ो पकड़ो खेल रहे थे ,
यह मेरी शरारत ही तो थी ,
जो उम्र का लिहाज छोड़ कर
 बस मस्ती से भागे जा रही थी,
मुस्कान हंसी ठिठोली साथ लेकर,

Sunday, 27 September 2020

नफरत छोड़ शांति को बड़ा डालो

ऊंचे ऊंचे घर तो बन गए
दिल में जगह छोटी पड़ गई
हमको अब यह करना है, 
माटी से ही बने हम हैं ,
माटी में हमको मिलना है
माटी में हमको मिलना है।

ईर्ष्या द्वेष से भूलकर हमको,
छोड़ द्वेषभावों को अपने,
सबके दिलों में हमको रहना है,
खोल दिलों के द्वारों को अपने,
अपनों के दिलों में हमको बसना है,
दिलों में हमको बसना है।

पहले सोते थे हम जल्दी ,
और सुबह जग जाते थे,
चकाचौंध आराम में हम तो ,
भूल गए वह बातें सारी,
अपनी मस्ती में हम रहते,
 खुशियां सभी से छुपाते हैं,

वह भाईचारे की बातें ,
मिलकर साथ बैठते थे ,
 सोते जागते खाते पीते 
और साथ हम रहते थे,
एहसान में दबकर सब मिल,
 साथ काम हम करते थे,

लड़ते थे झगड़ते थे ,
लाठी डंडे चलते थे ,
और फिर हो एक जाते थे 
आज चलाकर गोलियां हम,
क्रूर बहुत बन जाते हैं,

भारत मां के लाल हो तुम,
काम इतना कर डालो
भारत मां के बेटों तुम
कुछ ऐसा काम कर डालो
अपने-अपने दिलों से भैया,
 नफरत को मिटा डालो 
नफरत को मिटाना लो,




Friday, 18 September 2020

कभी न जागूं ऐसी नींद सुला दे,

हे कन्हैया मुझे मौत की नींद सुला दे,
मेरी मौत थोड़ा ज्यादा बेहतर बना दे,

 कभी न जागूं ऐसी नींद मुझे सुला दे,
सारे जहां को मेरे ना होने की बात बता दें,

मेरे घर के बाहर थोड़ी भीड़ तो लगवा दे,
 मरने के बाद भी खुली रहे आंखें मेरी,

खुली आंखों से सनम का दीदार करा दे,
इसी बहाने मुझे मेरे महबूब से मिला दे,

 जो कतराते हैं मुझसे बात करने में,
उन्हीं के कांधे पर मुझे उठवा दे,

जिनकी यादों में हम रात भर रोते हैं,
उन्हें भी मेरी याद में उतना ही रुला दे,

जिन हाथों से चाहा था उठवाना घुंघट,
उन्ही हाथों से मेरा चेहरा ढकवा दे,

वरमाला नहीं हुई तो क्या हुआ ,
अर्थी पर ही मेरे हार पहनावा दें,

इजहार ए मोहब्बत के लिए ,
फूल लेकर दौड़ी हूं मैं जिनके पीछे ,

आंखों में आंसू भर कर रोते हुए,
उन्हें मेरे चौथे पर फूल लेकर भिजवा दें,

जीवन में साथ जिनके रह पाई नहीं,
प्रेत बन कर जीवन भर डराऊंगी,

कोई जाकर उन्हें इतना तो बतला दे ,
मरकर काले साए से डराऊंगी मैं,

जिन्हें रहम नहीं मेरी मासूमियत पर,
काला साया बनकर रहम ना खाऊंगी मैं,

भविष्य में साथ ना मिला अगर,
भूत बन कर सदा साथ निभाऊंगी मैं,

चाहत ने जिनकी शायर बना दिया,
यह खबर उन तक पहुंचवा दे,

हे कन्हैया ,
मुझे इतना सबल कर,कि मैं उनको उठा लूं,
 या फिर उनके हाथों से मुझे ही उठवा दे,

                 साहित्यकार____ निशि द्विवेदी 
                                          पिंकी दिवेदी

Wednesday, 16 September 2020

तुम बिन रहा न जाए,

तुम बिन रहूं मैं कैसे ,
    कैसे जियूं मैं तुम बिन,

           मीलों लंबी लगी रातें,
                 सदियों से लंबा लगे लम्हा,

                         रुकती चलती रही सांसे,
                              सब कुछ अधूरा लगे तुम बिन,

महसूस खुद को मैंने ,
   कभी नहीं करती तुम बिन,

       पहाड़ों से ऊंचा दुख मेरा,
            बहुत ऊंचा लगे तुम बिन,

                  खुद को भी मैं सपना समझती ,
                       सपना समझती हूं तुम बिन,

                           साहित्यकार  ___  निशि दि्वेदी

Tuesday, 15 September 2020

राधे के चरणों में ही हम जिएंगे।

तुम्हारे लिए ही हम बने हैं,
 तुम बिन नहीं जी हम सकेंगे,

                  दुनिया हमें भुला ना सकेगी,
                  जुबां से सदा राधे-राधे कहेंगे,

राधे राधे ओ मेरी राधे,
 राधे राधे प्यारी राधे,

               राधे बिना श्याम कितना अकेला,
              तुम कहो छोड़ दूं मैं दुनिया का मेला,

कन्हैया कन्हैया प्यारे कन्हैया,
पार लगा दो तुम मेरी नैया,

               सारी दुनिया में लगाते हो फेरा ,
                  मेरे हृदय में डालो तुम डेरा,

श्याम बिना राधा कुछ भी नहीं,
राधा बिना श्याम कुछ भी नहीं,

                    राधे राधे जपो बिहारी मिलेंगे,
                     बिहारी जपो तो राधे तुम्हारी,

तुम को ही चाहता है दिल,

साजन बिन रहूं मैं कैसे ,
    कैसे जियूं मैं तुम बिन,

           मीलों लंबी लगी रातें,
                 सदियों से लंबा लगे लम्हा,

                         रुकती चलती रही सांसे,
                              सब कुछ अधूरा लगे तुम बिन,

महसूस खुद को मैंने ,
   कभी नहीं करती तुम बिन,

       पहाड़ों से ऊंचा दुख मेरा,
            बहुत ऊंचा लगे तुम बिन,

                  खुद को भी मैं सपना समझती ,
                       सपना समझती हूं तुम बिन,

                           साहित्यकार  ___  निशि दि्वेदी

Sunday, 13 September 2020

नहीं दूर का रिश्ता,

मेरे सांवरे ,
    मेरे सांवरे ,
        मेरे सांवरे ,
           ओ मेरे सांवरे,

नहीं था दूर का रिश्ता,
     कोई अपना नहीं थे तुम ,
          बड़ा महंगा पड़ा था इश्क ,
                     मेरा सपना हुए थे तुम,

लगाकर हाथ तुमको बस,
     तुम्हें मैं महसूस करती थी,
           ना तुम कुछ बोले ,
                  ना हम ही कुछ कहते थे,

बैठ कदम के नीचे ,
   तेरी राह मैं तकती थी,
        जुबा खामोश रहती थी,
              निगाहें बात करती थी,

मेरे पांव की पायल भी,
     तुम्हें तो याद होगी ही,
          मेरे हाथों की चूड़ी भी तो,
                खन खन खन खन करती थी,

सांवरे रूप तेरा तो,
    मुझे पागल बनाता था,
       तुम्हारी याद में जी कर,
             पल पल मैं तड़पती हूं,

मेरी हर सांस रो रोकर,
     तुम्हें बहुत याद करती है,
           कन्हैया मिल जाओ मुझको,
                  जरा सी बात करनी है।

तुम्हारी याद में जिंदा हूं,
      मैं तो मर नहीं सकती,
         तुम्हारी याद में जिंदा हूं ,
                या तुम भूल गए मुझको,

Friday, 11 September 2020

नारी हूं मैं ,मेरा भी तो, आजादी का दिल करता है।

नारी हूं मैं,
 मेरा भी तो ,
जीने का मन करता है,

गर्भ समय से कैद में थी,
 कभी तो खुलने का ,
मन करता है,

पापा बोले बेटी नहीं ,
बेटा हूं मैं,
फिर भी दिल में,
 डर रहता है,

मां कहती तू ,
बाहर मत जा ,
क्योंकि तू बेटी है,

अकेली नहीं तु ,
भाई संग जा,
क्योंकि तू बेटी है,

कितनी ही बड़ी ,
तु हो जा,
बाहर बहुत दरिंदगी है, 

मैं नारी हूं 
मैं दर्पण हूं ,
मैं प्रेम और समर्पण हूं

मैं बहन हूं ,
मैं बेटी हूं ,
अपने प्रिय की अर्धांगिनी हूं,
और मैं एक मां भी हूं,

जिस तन से पुरुष ने,
 जनम लिया है,
वह मंदिर है,
 वह मस्जिद है,
 वह गिरजाघर ,
और गुरुद्वारा है ,

क्यों हवस की,
 वेदी पर नारी चढ़ती ,
जीवित और मृत अवस्था में,

 क्यों अपमान,
 सह कर भी चुप रहती ,
समाज की कर्कशता में,

क्यों ,
बिना किसी अपराध के ,
किसी गरीब की बेटी जलती,

क्यों, 
कानून के दफ्तर में ,
यह सारी फाइल दबती,

क्यों ,
मासूम को,
 तिरस्कार है मिलता,
जो करती कोई अपराध नहीं,

क्यों,
 भारत मां के चरणों में,
 नारी की कुर्बानी होती,

क्यों , 
अपराधी को ,
छत्रछाया मिलती है,
राजनीति के सिपासलारोँ से,

वासना से परे होकर देखो,
 नारी सा कोई मित्र नहीं,

नारी हूं मैं,
 मेरा भी तो ,
जीने का मन करता है,

पिंजरे में ,
मैं कैद पड़ी हूं ,
उड़ने का मन करता है,

थोड़ी ,
मुझे आजादी दो,
 पंख फैलाकर खुले आसमानों में,
 मेरा भी, उड़ने का मन करता है,

नारी हूं मैं,
 मेरा भी तो,
 कुछ करने का मन करता है,

घर की चारदीवारी में ,
कैद पड़ी हूं ,
बाहर जाने का मन करता है,

मेरा भी,
देश की प्रगति में ,
हाथ बढ़ाने को मन करता है,

नारी हूं मैं ,
नारी हूं मैं,
 नारी हूं मैं,

(स्वरचित )
रचनाकार का नाम___ निशि द्विवेदी












Tuesday, 8 September 2020

एक मेरी मोहब्बत को ना समझे।

मेरे हर सवाल का, 
                       जवाब रखते हो।
मेरे हर खर्च का,
                    हिसाब रखते हो।
मेरे जज्बात का,
                    खयाल रखते हो।
मेरे हर फूल को,
                     संभाल रखते हो।
मेरी हर बात का,
                     विश्वास रखते हो।
मेरे हर अश्क का,
                      इंतकाम रखते हो।
मेरी हसरतों को ,
                       संभाल रखते हो।
बहुत चाहने का,
                       अंदाज रखते हो।

नहीं समझे सनम, नहीं समझे तुम।।
एक मेरी मोहब्बत को ही नहीं समझे तुम।।

Saturday, 5 September 2020

होने न दोगे आंखों से ओझल प्रिय

होने ना दूंगी आंखों से ओझल प्रिय,
 मैं तो पी लूंगी चार चार बोतल प्रिय है।
बोतल पियूंगी तुमरे प्रेम की,
नाचूंगी मैं भी तुमको नचाऊंगी,

नशा है मुझको तुमरे प्रेम का,
लगा है चस्का मुझे प्रेम का,
घूम घूम नाचूंगी तुमको नचाऊंगी,
तुम्हारे साथ में भी पागल बन जाऊंगी,

होने ना दूंगी,,,,,,,,

राधा के जैसी चुनरी लहराऊंगी,
मीरा के जैसा एक तारा बजाऊंगी,
 झूमूगी सारी रात, निधिवन मैं आऊंगी,
श्रृंगार करके दुल्हन मैं बन जाऊंगी,

होने ना दूंगी,,,,,,,,,,,,

जैसा कहोगे वैसा बन जाऊंगी,
 साथ तुम्हारे डफली बजाऊंगी,
बांसुरिया पर तुम्हारे दीवानी हो जाऊंगी,
हर हाल में तेरा साथ मै पाऊंगी,

होने न दूंगी तुमको किसी का,
 सौतन से सभी छुटकारा में पाऊंगी,
ध्यान तुम्हारा सारा मै अपने में लगाऊंगी,

होने ना दूंगी,,,,,,

            नाम_____ निशि द्विवेदी

संतो के समागम से उत्थान संस्कृत का

भारत के उत्थान वास्ते,
   कदम जो आगे रखा है,
     नहीं कोई साधारण यह ,
          तो भारत देश का बच्चा है,

आज शिक्षक दिवस पर ,
   यह जो कदम को आगे रखा है,
      संस्कृति के उत्थान के लिए ,
        जो अलख जगाकर रखी है,

संस्कृतियों से उरृड वास्ते,
   कदम जो आगे रखा है,
     देश के हित में काम करने,
        योगी जी ने पहल सुझाई है,

पौराणिक ग्रंथों में जैसे,
   संतो की सभाएं लगती थी,।                                     भारत संतों की नगरी है,
       पुनः संतों की सभा लगाई है,

   यूपी में जय हो योगी जी,
    देश का मेरे सौभाग्य बड़ा है,
        उन्नति के लिए यहां सदैव,
             देखो योगी सीएम खड़ा है,

देश को अपने गौरवान्वित ,
   करने को सदैव जगा है।
      सूरज सा चमकते भारत को,
           पाने की चाह निभाई है,

जय हो जय हो मोदी जी,
  और जय हो मेरे योगी जी, 
       इतिहास में संतों ने ,
          देश में राज किया है, 

  इतिहास लिखेंगे आज,
     पुनः मेरे केवल योगी जी,
         पुनः शासन करेंगे फिर से ,
                 मेरे इकलौते योगी जी,

संस्कृति के उत्थान वास्ते,
     संतो से आज चर्चा हुई,
        मेरे योगी का अंदाज निराला,
               यूपी में योगी राज निराला,

देववाणी में चर्चा करके,
  भारत में रामराज स्थापित होगा,
     भारत पुनः हिंदू राष्ट्र घोषित होगा,
       संस्कृत में वार्ता करके विश्व में नाम आएंगे,

साहित्यकार____ निशि द्विवेदी
                         पिंकी द्विवेदी

Tuesday, 1 September 2020

आज मैं बजाऊंगी बंसी तुम्हारी,

आज मैं बजाऊंगी बंसी तुम्हारी,
     आज मैं खोलूंगी पोल तुम्हारी,
           आज मैं सुनाऊंगी सभी को यह कहानी,

आज मैं बोलूंगी सुर तुम्हारे,
          आज मैं बजाऊंगी सुर तुम्हारे,
                      आज मैं खोलूंगी खेल यह सारा,
        
आज मैं जानूंगी राज तुम्हारा,
          आज मैं  छेडूंगी तार तुम्हारा,
                  कैसे पुकारे बंसी मेरा नाम राधा,

आज मैं खोलूंगी पोल तुम्हारी,
       आज मैं जानू की बात यह सारी,
                       आज मैं जानूंगी भेद ये सारा,

सात छिद्र हैं ,
       सात है स्वर,
              साथ है इससे बचपन का,

धरी अधरन पर,
       स्वास खींच के,
              प्राण फूंक दे,
                  श्रद्धा और समर्पण का,

सात सुरों पर उंगली नाचे,
       तर्जनी जैसे थरथर कांपै,
               राज बोल कर खोल दो कान्हा,

देखकर मेरी आंखों में ,
     सौगंध तुम्हें है यमुना की,                            
             है मोहिनी या जादू कोई,
                    या फिर है कोई हुनर तुम्हारा,
            
रचनाकार का नाम,_____ निशि द्विवेदी
(स्वरचित)                     पिंकी द्विवेदी

कान्हा तेरे प्यार में

कान्हा मेरो रसिया,

मेरो मन बसिया,

छोरो ब्रिज को बड़ों निरालो,

कोई इसको अपना बना लो,

सूरत से बड़ों भोलो भालो,

राधा को प्रिय मोहन नाम वालो,

मोरे नैनन में बसी छवि वालों,

 निशि कृष्ण नैनन में बसो सदा बसो,

Monday, 31 August 2020

नीतिपरक और सच्ची बातें बच्चों को बताई रखिए।

देश प्रेम दिल में जगाई रखिए,
   राष्ट्रहित में कलाम लिखाई रखिए,
       राष्ट्रगान में तन सावधान बनाई रखिए,

चापलूसो से जुदाई रखिए,
    हितैषीयो से मिलाई रखिए,
        ईश्वर से सत्य की सदैव दुहाई रखिए,

प्रभु को मन बसाई रखिए,
     घर में कुछ दवाई रखिए,
           चिंतन मनन के लिए तन्हाई रखिए,

घर में कभी ना जमाई रखिए,
   मन में सदैव समाई रखिए,
      जीवन में मौज मस्ती और घुमाई रखिए,

छुपा कर अपनी कमाई रखिए,
   सत्य की अलख जगाई रखिए,
        मेरा तेरा ना करना  सदैव हमाई रखिए,

भजनों में मन रमाई रखिए,
     पुत्री को घर पर दबाई रखिए,
          लक्ष्मी को घर में सब से छुपाई रखिए,

स्वभाव अपना सहाई रखिए,
     पुलिस को  खवाई रखिए,
         घर को सदा साफ सुथरा सुहाई रखिए,

शत्रु को सदा हराई रखिए,
    बातों में अपनी दमाई रखिए,
       किसी के घर जाए तो हाथ में मिठाई रखिए,

दूध में मलाई रखिए,
     जल को हलाई रखिए,
            लेन-देन में हमेशा-हमेशा सफाई रखिए,

बुराइयों को उड़ाई रखिए,
     अच्छाइयों को छुपाई रखिए,
            रिश्तेदारों से लेनदेन सदैव बचाई रखिए,

चटनी में थोड़ी खटाई रखिए,
      सुख दुख में सदैव समाई रखिए,
            हरियाली देश में बहुत बहुत बढ़ाई रखिए,

दीन हीनो पर दया बनाई रखिए,
      पशु प्रेम दिल में जगाई रखिए,
             समय पर इनकी खिलाई ,पिलाई रखिए,

सेवक को चार बातें सुनाई रखिए,
     सहायता भरपूर कराई रखिए,
             सभी से मित्रवत मिलाई, जुलाई रखिए,

मुख को गर्म से बचाई रखिए,
    नेत्रों को चमक से बचाई रखिए,
           मादक पदार्थों के सेवन से बचाई रखिए,

(स्वरचित)
 रचनाकार का नाम____निशि द्विवेदी
                                  (पिंकी दिवेदी)

Sunday, 30 August 2020

दर्पण कहे श्रंगार कर आंखें काली रखें,

गुरु कहे लिखना जारी रखें,

  ससुर कहे बहू चाय की प्याली रखें,

        पति कहे थाली में व्यंजन चारी रखें,

                   सास कहे बहू अचारी रखें,

              घर की साज-सज्जा जारी रखें,
            
समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,


मेहमान कहे शिष्टाचार ही रखें,

   फॉलोवर्स कहे कविता जारी रखें,

      प्रकृति कहे घर में हरियाली रखें,

          सांझ,सवेरे घर के मंदिर में दियाली रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,


घर कहे कूड़े को बाहरी रखें,

    परिजन का पूरा ख्याली रखें,
    
        भिखारी कहे दान पुन जारी रखें,

                दर्पण कहे थोड़ा श्रंगारी रखें,

       अखियां कारी और होठों पर लाली रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,

गाड़ी कहे मुझ पर सवारी रखें,

पड़ोसन कहे सखी व्यवहारी रखें,

     सखियां कहे गुफ्तगू जारी रखें,

        पार्टियां कहे  बनारसी साड़ी रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,

दिन के सारे काम कर ,
   रात में बैठी लिखने को ,
       बच्चे बोले ओ कवित्री मां,
              कमरे में अधिआरी रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें।
कोई बताए कैसे हम कविता लिखना जारी रखे।।
😱
(स्वरचित )रचनाकार का नाम ____निशी दिवेदी

Friday, 28 August 2020

तुमको ना भूल पाएंगे,

चांद मुझे बहुत प्यारा था,
 चांद पर बसने का शौक निराला था,

  बहनों ने मुझे चांद पुकारा था,
चांद पर जाने का सपना बड़ा पुराना था,

चांद के जैसा मैंने भी चकोर को चाहा था,
मुझे उसकी उसे मेरी दौलत की चाहत थी,

मैं इस बात से अंजान था ,
मैं उस रात से अंजान था,

जब दर्द से तड़प रहा था,
 चाहत मेरे सामने रही होगी,

सुना है इंसानियत का रिश्ता,
 हर रिश्ते में अपना भाई अपना बेटा ,

ढुंढ ही लेता है,
तो क्या उसका?????? 

लोग मुझे जब मार रहे होंगे,
 हाथापाई तो हुई होगी ,

मैं  चीख, चिल्ला रहा हूंगा,
मैं तड़पा भी ,रोया भी हूं गा ,

मेरे गले में फंदा डाल रहे थे ,
अपराधी मुझको मार रहे थे,

मदद के लिए पुकारा तो होगा,
 तड़पता रहा हूं गा,

कितना संघर्षशील जीवन था मेरा ,
आखरी सांस तक मैं लड़ा तो हूगा।

कितनी निर्दई थी वो आंखें ,जिन्हें दया नहीं आई।
सारे छूट गए वही मेरे अपने, हाथ में तन्हाई आई।।

      स्वरचित रचनाकार का नाम ____निशि द्विवेदी
                                                  ( पिंकी द्विवेदी)  

खोने का डर

जितनी शिद्दत तुम्हें पाने की थी                 उससे ज्यादा डर तुम्हें खोने का है बस यही है कि तुमसे लड़ती नहीं           तुम यह ना समझना कि...