Friday, 16 October 2020

हास्य कलाकार पिंकू दि्वेदी

हंसते हैं,
 हंसाते हैं,
 नाम अपना,
 पंडित जी बताते हैं,
फेसबुक में भी आते हैं
नय नय पोस्ट लगाते हैं,

हंसते हैं ,
बहुत हंसाते हैं,
 यूट्यूब में भी आते हैं,
दुखा दुखा कर पेट हंसाते हैं,
नाम अपना पिंकू द्विवेदी बताते हैं,

खुश रहते ,
 खुशी बढ़ाते हैं,
कानपुर में रहते हैं,
 उन्नाव ग्राम बेहतर बताते हैं,
बिजनेसमैन है टॉप क्लास के,
दिलों में सबके घर बनाते हैं,

सभी वर्गों के प्यारे हैं,
बच्चों की तो जान है वह,
जवानों की भैया कहलाते हैं,
बुढो में भी रम जाते हैं,

देशवासियों की जान हैं पिकू भैया,
हमारे देश की शान है पिंकू भैया,
सबके प्यारे पिकू भैया,
सब कहते हैं पिंकू भैया,

             साहित्यकार ____निशि द्विवेदी


Sunday, 11 October 2020

बस तुम साथ होते।

मैंने कब चाहा था कि,
                           सारा चमन हमारा हो,
तुम चार पंखुड़ी फूलों की,
                             मेरे ऊपर से गिरा देते।
मैंने कब मांगा था तुमसे,
                               ज्वेलरी सोने की,
तुम एक फूल ही हंसकर,
                             मेरे बालों में लगा देते।
मैंने कब मांगी थी तुमसे ,
                                शिमला सी ठंडक,
साथ बैठकर मेरे संग तुम, 
                           पूनम का चांद निहार लेते।
मैंने कब बोला था तुमसे ,
                          दौलत का अंबार लगा दो,
तुम साथ बैठकर मेरे,
                        गीत जुगलबंदी के गा लेते।
मैंने तो बस चाहा था,
                      मेरे हाथ में हाथ तुम्हारा हो,
साथ बैठकर हमने,
                        जो भी कसमें खाई थी,
तुम सब कुछ ही भुला बैठे ,
                             मैं तो भूल ना पाऊंगी।
मैंने कहा सोचा था,
                       तुम से बिछड़ कर जीने की,
तुम एक बार चले आते ,
                            हम सब कुछ भुला देते। 
मैंने कब मांगा था तुमसे ,
                           घर आंगन और गलियां हो,
साथ होते तो हम तुम ,
                         एक आशियाना बना लेते।
                 साहित्यकार____ निशि द्विवेदी

Friday, 9 October 2020

पैसे से ही रिश्ता कैसा?

पैसा पैसा पैसा*****
 हाय पैसा पैसा******
 पैसे के लिए ही """"
ईमान धर्म है बिकता ....
पैसे से है यारी........
 पैसे से है रिश्ता...........
पैसे से ही होता ...
रिश्तो का सौदा......
पैसा पैसा पैसा हाय पैसा पैसा....
पैसा पैसा पैसा वाह रे पैसा पैसा!!!!!!!

चंद कागज़ के टुकड़े .....
और सिक्कों की खनक में .....
लोग बौराय जाते.....
अच्छे लोग भुलाए जाते...
पैसा पैसा पैसा...
 वाह रे पैसा पैसा.......
पैसा पैसा पैसा...
 हाय पैसा पैसा.....

भावनाओं के परिंदे...
 बस धरा पर रेंगते....
पैसे की चमक में ....
लोग अंधे हो जाते ...
पैसों की चमक में...
 बिना पंख के उड़ जाते...

वाह रे पैसा पैसा ....
वाह रे पैसा पैसा!!!!!!
पैसे के लिए ही मां-बाप भुलाए जाते...

 पैसे के लिए ही ...
जाने कितने दिल तोड़े जाते.....
दूर दूर के रिश्ते पैसे से जोड़े जाते ...
और करीब के रिश्ते पैसे के लिए तोड़े जाते...

पैसा पैसा पैसा वाह रे पैसा पैसा...
कैसा कैसा कैसा पैसे से रिश्ता कैसा....
सब को यह पता है ....
फिर भी भूल जाते .....
खाली हाथ आए थे,,,,,
 खाली हाथ ही जाते.....

कैसा कैसा कैसा पैसे से रिश्ता कैसा....
 बस जीते जी का रिश्ता.... 
गिर जाते हैं नीचे ......
कुछ सिक्को के लिए...
हजारों को दुनिया से उठा देते,,,
बस कुछ सिखों के लिए,,,,,,

ऐसा ऐसा ऐसा ....
ऐसा क्यों है होता ,,,,
जन्म की नौछावर से,,,
 अंत तक बस पैसा,,,
 पैसा पैसा पैसा हाय पैसा पैसा,,,,,,,
 पैसा पैसा पैसा पैसे से ही रिश्ता

            साहित्यकार ___ निशि द्विवेदी

Monday, 5 October 2020

शरारत खो गई है कहीं चलो मिलकर ढूंढो,

शरारत की ही नहीं मैंने,
 मुझसे हो गई है,
बचपन में होती थी ,
अब कहीं खो गई है,
चलो मिलकर ढूंढो,
लगता है कहीं सो रही है,
 शरारत कर जिस आंचल में छुप जाती थी,
जाकर मां के आंचल में ढूंढी,
 नहीं मिली,
सखियों से बोला मेरी शरारत कहीं खो गई है,
वह बोली बाद में बात करना अभी मैं व्यस्त हूं,
बच्चों से पूछा मेरी शरारत कहां गई है,
वह बोले तेरी तो पता नहीं ,
मेरी तो बसते के नीचे दबी पड़ी है,
पड़ोसी को बोला मेरी शरारत कहीं चली गई है,
वह बोले बाद में बात करेंगे अभी समय नहीं है,
थाने गई मैं रपट लिखाने,
मैं बोली मेरी शरारत मिल नहीं रही है,
दरोगा बोले क्या क्या साथ लेकर गई है ,
मैं बोली जब से शरारत गई है,
 मेरी हंसी को साथ ले गई है,
 खुशी भी कहीं मिल नहीं रही है,
उदासी मेरे घर में बिखरी पड़ी है,
वह बोले रिश्तेदारों को फोन करके पूछो,
उनके घर तो नहीं चली गई है,
मैं बोली ना उनकी भी जिम्मेदारियों में दबी पड़ी है,
सब के फोन आ रहे हैं मेरे पास बारी-बारी ,
उनकी भी कहीं खो गई है, कहीं चली गई है,
वह बोले 24 घंटे ढूंढ लो, मिल जाए तो बता देना,
मैं उदास आंखों से ढूंढ रही थी,
मेरी शरारत मुझे कहीं नहीं मिल रही थी,
उदासी की चादर ओढ़ के जब मैं घर आई,
मुझे थोड़ी उबासी आई,
बस थोड़ी पलक झपकाए
अगले ही पल मेरी आंखें पति से जा टकराई,
हमारी नजरें आपस में टकराई,
चेहरे पर मुस्कुराहट आई,
मैंने मेरी मुस्कुराहट वापस पाई,
फिर जो हुआ बस कहना क्या था,
उनकी आंखों में शरारत ने डेरा डाला था,
एक फूल मेरी ओर शरारत से फेंका,
बस फिर क्या था मैंने भी पूरा गुलदस्ता ,
उन पर दे मारा,
और अपनी शरारत को वापस पाया,
 मैं भाग रही थी आगे आगे,
और पूरा घर मेरे पीछे पीछे ,
बच्चे भी संग भाग रहे थे ,
सब मिलकर पकड़ो पकड़ो खेल रहे थे ,
यह मेरी शरारत ही तो थी ,
जो उम्र का लिहाज छोड़ कर
 बस मस्ती से भागे जा रही थी,
मुस्कान हंसी ठिठोली साथ लेकर,

Sunday, 27 September 2020

नफरत छोड़ शांति को बड़ा डालो

ऊंचे ऊंचे घर तो बन गए
दिल में जगह छोटी पड़ गई
हमको अब यह करना है, 
माटी से ही बने हम हैं ,
माटी में हमको मिलना है
माटी में हमको मिलना है।

ईर्ष्या द्वेष से भूलकर हमको,
छोड़ द्वेषभावों को अपने,
सबके दिलों में हमको रहना है,
खोल दिलों के द्वारों को अपने,
अपनों के दिलों में हमको बसना है,
दिलों में हमको बसना है।

पहले सोते थे हम जल्दी ,
और सुबह जग जाते थे,
चकाचौंध आराम में हम तो ,
भूल गए वह बातें सारी,
अपनी मस्ती में हम रहते,
 खुशियां सभी से छुपाते हैं,

वह भाईचारे की बातें ,
मिलकर साथ बैठते थे ,
 सोते जागते खाते पीते 
और साथ हम रहते थे,
एहसान में दबकर सब मिल,
 साथ काम हम करते थे,

लड़ते थे झगड़ते थे ,
लाठी डंडे चलते थे ,
और फिर हो एक जाते थे 
आज चलाकर गोलियां हम,
क्रूर बहुत बन जाते हैं,

भारत मां के लाल हो तुम,
काम इतना कर डालो
भारत मां के बेटों तुम
कुछ ऐसा काम कर डालो
अपने-अपने दिलों से भैया,
 नफरत को मिटा डालो 
नफरत को मिटाना लो,




Friday, 18 September 2020

कभी न जागूं ऐसी नींद सुला दे,

हे कन्हैया मुझे मौत की नींद सुला दे,
मेरी मौत थोड़ा ज्यादा बेहतर बना दे,

 कभी न जागूं ऐसी नींद मुझे सुला दे,
सारे जहां को मेरे ना होने की बात बता दें,

मेरे घर के बाहर थोड़ी भीड़ तो लगवा दे,
 मरने के बाद भी खुली रहे आंखें मेरी,

खुली आंखों से सनम का दीदार करा दे,
इसी बहाने मुझे मेरे महबूब से मिला दे,

 जो कतराते हैं मुझसे बात करने में,
उन्हीं के कांधे पर मुझे उठवा दे,

जिनकी यादों में हम रात भर रोते हैं,
उन्हें भी मेरी याद में उतना ही रुला दे,

जिन हाथों से चाहा था उठवाना घुंघट,
उन्ही हाथों से मेरा चेहरा ढकवा दे,

वरमाला नहीं हुई तो क्या हुआ ,
अर्थी पर ही मेरे हार पहनावा दें,

इजहार ए मोहब्बत के लिए ,
फूल लेकर दौड़ी हूं मैं जिनके पीछे ,

आंखों में आंसू भर कर रोते हुए,
उन्हें मेरे चौथे पर फूल लेकर भिजवा दें,

जीवन में साथ जिनके रह पाई नहीं,
प्रेत बन कर जीवन भर डराऊंगी,

कोई जाकर उन्हें इतना तो बतला दे ,
मरकर काले साए से डराऊंगी मैं,

जिन्हें रहम नहीं मेरी मासूमियत पर,
काला साया बनकर रहम ना खाऊंगी मैं,

भविष्य में साथ ना मिला अगर,
भूत बन कर सदा साथ निभाऊंगी मैं,

चाहत ने जिनकी शायर बना दिया,
यह खबर उन तक पहुंचवा दे,

हे कन्हैया ,
मुझे इतना सबल कर,कि मैं उनको उठा लूं,
 या फिर उनके हाथों से मुझे ही उठवा दे,

                 साहित्यकार____ निशि द्विवेदी 
                                          पिंकी दिवेदी

Wednesday, 16 September 2020

तुम बिन रहा न जाए,

तुम बिन रहूं मैं कैसे ,
    कैसे जियूं मैं तुम बिन,

           मीलों लंबी लगी रातें,
                 सदियों से लंबा लगे लम्हा,

                         रुकती चलती रही सांसे,
                              सब कुछ अधूरा लगे तुम बिन,

महसूस खुद को मैंने ,
   कभी नहीं करती तुम बिन,

       पहाड़ों से ऊंचा दुख मेरा,
            बहुत ऊंचा लगे तुम बिन,

                  खुद को भी मैं सपना समझती ,
                       सपना समझती हूं तुम बिन,

                           साहित्यकार  ___  निशि दि्वेदी

Tuesday, 15 September 2020

राधे के चरणों में ही हम जिएंगे।

तुम्हारे लिए ही हम बने हैं,
 तुम बिन नहीं जी हम सकेंगे,

                  दुनिया हमें भुला ना सकेगी,
                  जुबां से सदा राधे-राधे कहेंगे,

राधे राधे ओ मेरी राधे,
 राधे राधे प्यारी राधे,

               राधे बिना श्याम कितना अकेला,
              तुम कहो छोड़ दूं मैं दुनिया का मेला,

कन्हैया कन्हैया प्यारे कन्हैया,
पार लगा दो तुम मेरी नैया,

               सारी दुनिया में लगाते हो फेरा ,
                  मेरे हृदय में डालो तुम डेरा,

श्याम बिना राधा कुछ भी नहीं,
राधा बिना श्याम कुछ भी नहीं,

                    राधे राधे जपो बिहारी मिलेंगे,
                     बिहारी जपो तो राधे तुम्हारी,

तुम को ही चाहता है दिल,

साजन बिन रहूं मैं कैसे ,
    कैसे जियूं मैं तुम बिन,

           मीलों लंबी लगी रातें,
                 सदियों से लंबा लगे लम्हा,

                         रुकती चलती रही सांसे,
                              सब कुछ अधूरा लगे तुम बिन,

महसूस खुद को मैंने ,
   कभी नहीं करती तुम बिन,

       पहाड़ों से ऊंचा दुख मेरा,
            बहुत ऊंचा लगे तुम बिन,

                  खुद को भी मैं सपना समझती ,
                       सपना समझती हूं तुम बिन,

                           साहित्यकार  ___  निशि दि्वेदी

Sunday, 13 September 2020

नहीं दूर का रिश्ता,

मेरे सांवरे ,
    मेरे सांवरे ,
        मेरे सांवरे ,
           ओ मेरे सांवरे,

नहीं था दूर का रिश्ता,
     कोई अपना नहीं थे तुम ,
          बड़ा महंगा पड़ा था इश्क ,
                     मेरा सपना हुए थे तुम,

लगाकर हाथ तुमको बस,
     तुम्हें मैं महसूस करती थी,
           ना तुम कुछ बोले ,
                  ना हम ही कुछ कहते थे,

बैठ कदम के नीचे ,
   तेरी राह मैं तकती थी,
        जुबा खामोश रहती थी,
              निगाहें बात करती थी,

मेरे पांव की पायल भी,
     तुम्हें तो याद होगी ही,
          मेरे हाथों की चूड़ी भी तो,
                खन खन खन खन करती थी,

सांवरे रूप तेरा तो,
    मुझे पागल बनाता था,
       तुम्हारी याद में जी कर,
             पल पल मैं तड़पती हूं,

मेरी हर सांस रो रोकर,
     तुम्हें बहुत याद करती है,
           कन्हैया मिल जाओ मुझको,
                  जरा सी बात करनी है।

तुम्हारी याद में जिंदा हूं,
      मैं तो मर नहीं सकती,
         तुम्हारी याद में जिंदा हूं ,
                या तुम भूल गए मुझको,

Friday, 11 September 2020

नारी हूं मैं ,मेरा भी तो, आजादी का दिल करता है।

नारी हूं मैं,
 मेरा भी तो ,
जीने का मन करता है,

गर्भ समय से कैद में थी,
 कभी तो खुलने का ,
मन करता है,

पापा बोले बेटी नहीं ,
बेटा हूं मैं,
फिर भी दिल में,
 डर रहता है,

मां कहती तू ,
बाहर मत जा ,
क्योंकि तू बेटी है,

अकेली नहीं तु ,
भाई संग जा,
क्योंकि तू बेटी है,

कितनी ही बड़ी ,
तु हो जा,
बाहर बहुत दरिंदगी है, 

मैं नारी हूं 
मैं दर्पण हूं ,
मैं प्रेम और समर्पण हूं

मैं बहन हूं ,
मैं बेटी हूं ,
अपने प्रिय की अर्धांगिनी हूं,
और मैं एक मां भी हूं,

जिस तन से पुरुष ने,
 जनम लिया है,
वह मंदिर है,
 वह मस्जिद है,
 वह गिरजाघर ,
और गुरुद्वारा है ,

क्यों हवस की,
 वेदी पर नारी चढ़ती ,
जीवित और मृत अवस्था में,

 क्यों अपमान,
 सह कर भी चुप रहती ,
समाज की कर्कशता में,

क्यों ,
बिना किसी अपराध के ,
किसी गरीब की बेटी जलती,

क्यों, 
कानून के दफ्तर में ,
यह सारी फाइल दबती,

क्यों ,
मासूम को,
 तिरस्कार है मिलता,
जो करती कोई अपराध नहीं,

क्यों,
 भारत मां के चरणों में,
 नारी की कुर्बानी होती,

क्यों , 
अपराधी को ,
छत्रछाया मिलती है,
राजनीति के सिपासलारोँ से,

वासना से परे होकर देखो,
 नारी सा कोई मित्र नहीं,

नारी हूं मैं,
 मेरा भी तो ,
जीने का मन करता है,

पिंजरे में ,
मैं कैद पड़ी हूं ,
उड़ने का मन करता है,

थोड़ी ,
मुझे आजादी दो,
 पंख फैलाकर खुले आसमानों में,
 मेरा भी, उड़ने का मन करता है,

नारी हूं मैं,
 मेरा भी तो,
 कुछ करने का मन करता है,

घर की चारदीवारी में ,
कैद पड़ी हूं ,
बाहर जाने का मन करता है,

मेरा भी,
देश की प्रगति में ,
हाथ बढ़ाने को मन करता है,

नारी हूं मैं ,
नारी हूं मैं,
 नारी हूं मैं,

(स्वरचित )
रचनाकार का नाम___ निशि द्विवेदी












Tuesday, 8 September 2020

एक मेरी मोहब्बत को ना समझे।

मेरे हर सवाल का, 
                       जवाब रखते हो।
मेरे हर खर्च का,
                    हिसाब रखते हो।
मेरे जज्बात का,
                    खयाल रखते हो।
मेरे हर फूल को,
                     संभाल रखते हो।
मेरी हर बात का,
                     विश्वास रखते हो।
मेरे हर अश्क का,
                      इंतकाम रखते हो।
मेरी हसरतों को ,
                       संभाल रखते हो।
बहुत चाहने का,
                       अंदाज रखते हो।

नहीं समझे सनम, नहीं समझे तुम।।
एक मेरी मोहब्बत को ही नहीं समझे तुम।।

Saturday, 5 September 2020

होने न दोगे आंखों से ओझल प्रिय

होने ना दूंगी आंखों से ओझल प्रिय,
 मैं तो पी लूंगी चार चार बोतल प्रिय है।
बोतल पियूंगी तुमरे प्रेम की,
नाचूंगी मैं भी तुमको नचाऊंगी,

नशा है मुझको तुमरे प्रेम का,
लगा है चस्का मुझे प्रेम का,
घूम घूम नाचूंगी तुमको नचाऊंगी,
तुम्हारे साथ में भी पागल बन जाऊंगी,

होने ना दूंगी,,,,,,,,

राधा के जैसी चुनरी लहराऊंगी,
मीरा के जैसा एक तारा बजाऊंगी,
 झूमूगी सारी रात, निधिवन मैं आऊंगी,
श्रृंगार करके दुल्हन मैं बन जाऊंगी,

होने ना दूंगी,,,,,,,,,,,,

जैसा कहोगे वैसा बन जाऊंगी,
 साथ तुम्हारे डफली बजाऊंगी,
बांसुरिया पर तुम्हारे दीवानी हो जाऊंगी,
हर हाल में तेरा साथ मै पाऊंगी,

होने न दूंगी तुमको किसी का,
 सौतन से सभी छुटकारा में पाऊंगी,
ध्यान तुम्हारा सारा मै अपने में लगाऊंगी,

होने ना दूंगी,,,,,,

            नाम_____ निशि द्विवेदी

संतो के समागम से उत्थान संस्कृत का

भारत के उत्थान वास्ते,
   कदम जो आगे रखा है,
     नहीं कोई साधारण यह ,
          तो भारत देश का बच्चा है,

आज शिक्षक दिवस पर ,
   यह जो कदम को आगे रखा है,
      संस्कृति के उत्थान के लिए ,
        जो अलख जगाकर रखी है,

संस्कृतियों से उरृड वास्ते,
   कदम जो आगे रखा है,
     देश के हित में काम करने,
        योगी जी ने पहल सुझाई है,

पौराणिक ग्रंथों में जैसे,
   संतो की सभाएं लगती थी,।                                     भारत संतों की नगरी है,
       पुनः संतों की सभा लगाई है,

   यूपी में जय हो योगी जी,
    देश का मेरे सौभाग्य बड़ा है,
        उन्नति के लिए यहां सदैव,
             देखो योगी सीएम खड़ा है,

देश को अपने गौरवान्वित ,
   करने को सदैव जगा है।
      सूरज सा चमकते भारत को,
           पाने की चाह निभाई है,

जय हो जय हो मोदी जी,
  और जय हो मेरे योगी जी, 
       इतिहास में संतों ने ,
          देश में राज किया है, 

  इतिहास लिखेंगे आज,
     पुनः मेरे केवल योगी जी,
         पुनः शासन करेंगे फिर से ,
                 मेरे इकलौते योगी जी,

संस्कृति के उत्थान वास्ते,
     संतो से आज चर्चा हुई,
        मेरे योगी का अंदाज निराला,
               यूपी में योगी राज निराला,

देववाणी में चर्चा करके,
  भारत में रामराज स्थापित होगा,
     भारत पुनः हिंदू राष्ट्र घोषित होगा,
       संस्कृत में वार्ता करके विश्व में नाम आएंगे,

साहित्यकार____ निशि द्विवेदी
                         पिंकी द्विवेदी

Tuesday, 1 September 2020

आज मैं बजाऊंगी बंसी तुम्हारी,

आज मैं बजाऊंगी बंसी तुम्हारी,
     आज मैं खोलूंगी पोल तुम्हारी,
           आज मैं सुनाऊंगी सभी को यह कहानी,

आज मैं बोलूंगी सुर तुम्हारे,
          आज मैं बजाऊंगी सुर तुम्हारे,
                      आज मैं खोलूंगी खेल यह सारा,
        
आज मैं जानूंगी राज तुम्हारा,
          आज मैं  छेडूंगी तार तुम्हारा,
                  कैसे पुकारे बंसी मेरा नाम राधा,

आज मैं खोलूंगी पोल तुम्हारी,
       आज मैं जानू की बात यह सारी,
                       आज मैं जानूंगी भेद ये सारा,

सात छिद्र हैं ,
       सात है स्वर,
              साथ है इससे बचपन का,

धरी अधरन पर,
       स्वास खींच के,
              प्राण फूंक दे,
                  श्रद्धा और समर्पण का,

सात सुरों पर उंगली नाचे,
       तर्जनी जैसे थरथर कांपै,
               राज बोल कर खोल दो कान्हा,

देखकर मेरी आंखों में ,
     सौगंध तुम्हें है यमुना की,                            
             है मोहिनी या जादू कोई,
                    या फिर है कोई हुनर तुम्हारा,
            
रचनाकार का नाम,_____ निशि द्विवेदी
(स्वरचित)                     पिंकी द्विवेदी

कान्हा तेरे प्यार में

कान्हा मेरो रसिया,

मेरो मन बसिया,

छोरो ब्रिज को बड़ों निरालो,

कोई इसको अपना बना लो,

सूरत से बड़ों भोलो भालो,

राधा को प्रिय मोहन नाम वालो,

मोरे नैनन में बसी छवि वालों,

 निशि कृष्ण नैनन में बसो सदा बसो,

Monday, 31 August 2020

नीतिपरक और सच्ची बातें बच्चों को बताई रखिए।

देश प्रेम दिल में जगाई रखिए,
   राष्ट्रहित में कलाम लिखाई रखिए,
       राष्ट्रगान में तन सावधान बनाई रखिए,

चापलूसो से जुदाई रखिए,
    हितैषीयो से मिलाई रखिए,
        ईश्वर से सत्य की सदैव दुहाई रखिए,

प्रभु को मन बसाई रखिए,
     घर में कुछ दवाई रखिए,
           चिंतन मनन के लिए तन्हाई रखिए,

घर में कभी ना जमाई रखिए,
   मन में सदैव समाई रखिए,
      जीवन में मौज मस्ती और घुमाई रखिए,

छुपा कर अपनी कमाई रखिए,
   सत्य की अलख जगाई रखिए,
        मेरा तेरा ना करना  सदैव हमाई रखिए,

भजनों में मन रमाई रखिए,
     पुत्री को घर पर दबाई रखिए,
          लक्ष्मी को घर में सब से छुपाई रखिए,

स्वभाव अपना सहाई रखिए,
     पुलिस को  खवाई रखिए,
         घर को सदा साफ सुथरा सुहाई रखिए,

शत्रु को सदा हराई रखिए,
    बातों में अपनी दमाई रखिए,
       किसी के घर जाए तो हाथ में मिठाई रखिए,

दूध में मलाई रखिए,
     जल को हलाई रखिए,
            लेन-देन में हमेशा-हमेशा सफाई रखिए,

बुराइयों को उड़ाई रखिए,
     अच्छाइयों को छुपाई रखिए,
            रिश्तेदारों से लेनदेन सदैव बचाई रखिए,

चटनी में थोड़ी खटाई रखिए,
      सुख दुख में सदैव समाई रखिए,
            हरियाली देश में बहुत बहुत बढ़ाई रखिए,

दीन हीनो पर दया बनाई रखिए,
      पशु प्रेम दिल में जगाई रखिए,
             समय पर इनकी खिलाई ,पिलाई रखिए,

सेवक को चार बातें सुनाई रखिए,
     सहायता भरपूर कराई रखिए,
             सभी से मित्रवत मिलाई, जुलाई रखिए,

मुख को गर्म से बचाई रखिए,
    नेत्रों को चमक से बचाई रखिए,
           मादक पदार्थों के सेवन से बचाई रखिए,

(स्वरचित)
 रचनाकार का नाम____निशि द्विवेदी
                                  (पिंकी दिवेदी)

Sunday, 30 August 2020

दर्पण कहे श्रंगार कर आंखें काली रखें,

गुरु कहे लिखना जारी रखें,

  ससुर कहे बहू चाय की प्याली रखें,

        पति कहे थाली में व्यंजन चारी रखें,

                   सास कहे बहू अचारी रखें,

              घर की साज-सज्जा जारी रखें,
            
समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,


मेहमान कहे शिष्टाचार ही रखें,

   फॉलोवर्स कहे कविता जारी रखें,

      प्रकृति कहे घर में हरियाली रखें,

          सांझ,सवेरे घर के मंदिर में दियाली रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,


घर कहे कूड़े को बाहरी रखें,

    परिजन का पूरा ख्याली रखें,
    
        भिखारी कहे दान पुन जारी रखें,

                दर्पण कहे थोड़ा श्रंगारी रखें,

       अखियां कारी और होठों पर लाली रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,

गाड़ी कहे मुझ पर सवारी रखें,

पड़ोसन कहे सखी व्यवहारी रखें,

     सखियां कहे गुफ्तगू जारी रखें,

        पार्टियां कहे  बनारसी साड़ी रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,

दिन के सारे काम कर ,
   रात में बैठी लिखने को ,
       बच्चे बोले ओ कवित्री मां,
              कमरे में अधिआरी रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें।
कोई बताए कैसे हम कविता लिखना जारी रखे।।
😱
(स्वरचित )रचनाकार का नाम ____निशी दिवेदी

Friday, 28 August 2020

तुमको ना भूल पाएंगे,

चांद मुझे बहुत प्यारा था,
 चांद पर बसने का शौक निराला था,

  बहनों ने मुझे चांद पुकारा था,
चांद पर जाने का सपना बड़ा पुराना था,

चांद के जैसा मैंने भी चकोर को चाहा था,
मुझे उसकी उसे मेरी दौलत की चाहत थी,

मैं इस बात से अंजान था ,
मैं उस रात से अंजान था,

जब दर्द से तड़प रहा था,
 चाहत मेरे सामने रही होगी,

सुना है इंसानियत का रिश्ता,
 हर रिश्ते में अपना भाई अपना बेटा ,

ढुंढ ही लेता है,
तो क्या उसका?????? 

लोग मुझे जब मार रहे होंगे,
 हाथापाई तो हुई होगी ,

मैं  चीख, चिल्ला रहा हूंगा,
मैं तड़पा भी ,रोया भी हूं गा ,

मेरे गले में फंदा डाल रहे थे ,
अपराधी मुझको मार रहे थे,

मदद के लिए पुकारा तो होगा,
 तड़पता रहा हूं गा,

कितना संघर्षशील जीवन था मेरा ,
आखरी सांस तक मैं लड़ा तो हूगा।

कितनी निर्दई थी वो आंखें ,जिन्हें दया नहीं आई।
सारे छूट गए वही मेरे अपने, हाथ में तन्हाई आई।।

      स्वरचित रचनाकार का नाम ____निशि द्विवेदी
                                                  ( पिंकी द्विवेदी)  

Thursday, 27 August 2020

रिया को मत होने देना रिहा।।

मेरी यह कविता सुशांत सिंह राजपूत को न्याय दिलाने की एक कोशिश है।
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  मेरा रूठ गया है सपना ।
  मेरा रूठ गया कोई अपना।

रेत की तरह कोई मुट्ठी से फिसल गया है।
मेरा अपना कोई मुझे तन्हा कर गया है।

दिल के आशियाने में बिठाया था मैंने।
वही मुझे कुचलकर निकल गया है।

तिनको को चुन चुन कर महल बनाया था।
दिल के फ्रेम में उसका फोटो भी लगाया था।।

लहर की तरह आया,  और बिखरा कर चल दिया।
आज मेरा दिल❤️ तिनको में बिखरा पड़ा है।

वादा किया था मैंने ,कि सफर के साथी बनेंगे।
चंद सिक्कों के लिए मुझे छोड़ कर चल दिए।।

कैसे बताऊं मैं ,कैसे तुम्हें जताऊं।
हाथ पैर दीवारों पर  पटक रहा हूं।।

चीख चीख कर पुकारू मैं नाम तुम्हारा।
दिल में लिखे नाम को आंसुओं से धो रहा हूं।।

मैं कैसे इसे समझाऊं मैं कैसे तुझे भुलाऊं।
जितना भुलाना चाहा, तू उतना रुलाती है।।

किस्मत वालों के हाथ में होती है वह लकीरे।
मेरे दिल में चुभती है तेरे नाम की लकीर ।।

तन्हा अकेला कर दिया जिंदगी की राहों में।
आज  बैठकर समुंदर के किनारे रो रहा हूं।।

चंद सिक्कों के लिए तूने मेरा प्यार ठुकराया
क्या वह सिक्के वह प्यार दे पाएंगे जो मैंने दिया।।

तेरी मासूमियत देख मैंने दुनिया छोड़ी।
तुझे मेरी मोहब्बत रास नहीं आई।।

कहते हैं मोहब्बत एक तरफा नहीं होती।
मैंने दिल से चाहा था , मुझे सजा मिली।।

सुशांत को मिटाया तू भी अशांत रहेगी।
रिया नाम था तेरा तू भी रिहा नहीं होगी।।

स्वरचित रचनाकार का नाम ____निशि दिवेदी

कोई लौटा दे मेरा बचपन।

आया सावन मनभावन।
      कर दे रोम रोम पावन।।
         कर दे वारि तन मन धन।
              कोई लौटा दे मेरा बचपन।।

जब से रूठा है बचपन।
    तब से देख रही दर्पण।।
          छुटा दौर खिलौनों का।
               पांव दहलीज के यौवन।।

जब से यौवन है आया।
    तब से उमंग है छाया।।
         नई तरंग मन भाया।
              नयन देख रहे दिवास्वप्न।।

एक दौर था यौवन का।
    नया पड़ाव है जीवन का।।
        बचपन याद बहुत आया।
               बचपन मस्त बहुत पाया।।

अभावग्रस्त था बचपन।
  कष्ट तनिक नहीं था बचपन।।
    जल्द आएगा दौर पचपन।
     कोई लौटा दे मेरा फिर से बचपन।।
     
   रचनाकार का नाम ____निशि दिवेदी 


Thursday, 20 August 2020

नारी का सम्मान करो।

ओम नमो नारायणा,
     नमः नारी नारायणी। 
         पृथम देव दयावान, 
            द्वतिय नारी कृपायनि,।।

 देव विराजे स्वर्ग धाम,
     नारी आधार धरा की।
          देवों की सर्व श्रेष्ठ कला ,
                नारी उपहार धरा की।।

पुरूष दुःखी थे बिन नारी,
  सात रंगों से सराबोर थी नारी,
       रूप लावण्य से युक्त नारी,
              सभी दुखों से मुक्ति नारी,

घनघोर घटा से केश थे काले,
     नीले नयन थे बड़े निराले,
         सुर्ख लाल होंठों की और,
              सुनहरी मुस्कान चेहरे की,

चन्द्रमा सी सुंदर काया,
    सूरज सा तेज ललाट,
         भुजाएं थीं लताऐं सी,
            मदमस्त हिरनी सी चाल,

कोयल सी मीठी बोली,
   लगे मोहिनी सी मुस्कान,
       मोती से थे दमक रहे दांत,
            फूलों सी कोमल मन वाली,

सुन्दर गहनों से लदी थी,
   श्रृंगार करे सजी धजी थी,
        नीले वस्त्र पहन रखी थी,
           घुनधाट निकाले खड़ी थी,

जो करें सम्मान नारी का,
     प्रभू प्रेम का अधिकारी है,
             नारी देवी का रूप है,
                   प्यार की प्रति मूर्ति है,

नारी का सम्मान करो,
    मत उसका अपमान करो,
                     नारी है अपराजिता,
               


                रचनाकार का नाम____निशि द्विवेदी

Sunday, 16 August 2020

कटु परंतु सत्य


                                       नाम ____निशि दि्वेदी 
            (पिंकी द्विवेदी)
 
उड़ती पतंग सा होता जीवन,
        तंग डोर में तनाव सा जीवन,
            ढीली डोर से बढ़ता जीवन,
                  जीवन साथी संग हाथ ,
                       पकड़ कर चलता जीवन,

साथ छूटे तो कटी ,
    पतंग सा गिरता जीवन,
          साथी सही तो मस्त ,
                पतंग सा उड़ता जीवन,

डोर गलत हाथों में ,
      तो ढलता जीवन,
         जिधर हवा का रुख ,
                 उधर हो लेता जीवन,

कामयाबी की सीढ़ी पकड़,
        कर चढ जाता जीवन ,
                डालकर लंगर उसे,
                          गिरा देता दुश्मन,

सुमति से ,
        चले तो चलता जीवन,
       कुमति से,
              कटी धरा पर गिरता जीवन,

पतंग के जैसा होता जीवन,
      तरह तरह की पतंगों सा,
           अनेक तरह का होता जीवन,
                     दिशा एक है ,
             अनेक राहों में चलता जीवन,

कौन घड़ी किस दिशा में जाएगा जीवन,
कौन घड़ी किस दिशा में पूरा होगा जीवन,

                          नाम ____निशि द्विवेदी

Tuesday, 11 August 2020

प्रकृति का राज ना जाने पावे , चाहे जितना विज्ञान पढ़ आवै,



कितना ज्यादा बरसा पानी ,
बड़े जोर से बरसा पानी,

 रात रात भर बरसा पानी,
झम झम झम झम बरसा पानी ,

भर गई नदियां भर गई नाले,
 भर गए तालाब और शिवाले ,

मेरे घर के आंगन में भी
 आज थोड़ा भर गया पानी,

बड़ी जोर से बरसा पानी,
 चम चम चम चम बिजली चमकी

 गढ़ गढ़ गढ़ गढ़ बादल गरजे 
और रात भर बरसा पानी 

मेरे घर आंगन में भी
 आज झमक के  बरसा पानी,

बड़ी जोर से बरसा पानी,
प्रकृति के खेल भी बड़े निराले,

 कहीं खिली धूप कहीं पर सूखे,
 और कहीं पर बरसा पानी,

कभी-कभी तो ऐसा होता 
काली घटा अजब छा जाती,

 और जोर से आंधी आती,
बादलों को उड़ा ले जाती,

कड़क कड़क कर बिजली चमकी,
 कड़क कड़क के बादल गरजे,

धरती फिर भी सूखी रह जाती,
प्यास धारा की बुझ ना पाती,

कभी-कभी तो दिल को,
 दर्द का एहसास करा जाता पानी,

गरज गरज कर रोता बादल,
आंसुओं से झड़ी सा बरसा पानी,

मानो दिल चीर कर दिखाता बादल,
आंसू गिराकर दर्द का एहसास दिखाता बादल,

और कभी आनंदित होकर,
झूम झूम कर नाच दिखाता बादल,

कभी आस्था का प्रतीक बन जाता बादल,
सावन की बरसे बदरिया मां की भीगे चुनरिया,

 नवरात्रि में फुहार बरसता बादल,
आस्था विश्वास जगाता बादल,

तानसेन के रागमल्हार पर झूम झूमकर बरसे ,
कभी-कभी तो प्यासी धरती बूंद बूंद को तरसे,

वर्षा का वजूद है बड़ा लुभावना ,
महीने भर बरस कर धरती हरियाली बड़ा जाते,

पूरे बस हरियाली जिस से वंचित रह जाती ,
जबकि यही का जल उठा कर दोबारा बरसाता पानी,

प्रकृति का राज नहीं कोई जाने,
मानव कितना विज्ञान पढ़ जावे,

                                नाम____निशि दि्वेदी




 

Saturday, 1 August 2020

नहीं भाता कोई चेहरा,

नहीं भाता कोई चेहरा,
       तुझे पाना मजबूरी है,
             ठहरती कहीं नहीं आंखें,
                       तेरा मिलना जरूरी है,

कान्हा अब चले आओ,
         तेरा आना जरूरी है,
               तेरे मंदिर में मेरा आना ,
                        तेरी मूरत में समा जाना,

तेरी सूरत में जो आंखें,
     उन आंखों में ही खो जाना,
             दिखे पुतली में तेरा चेहरा,
                      नहीं कुछ भी नजर आता,

लगा चस्का जब से तेरा,
   कुछ और मुझे नहीं भाता,
        बस याद मुझे है कृष्ण राधा,
              अलावा इसके कुछ नहीं भाता,

सुना है तुम चले आते ,
    भक्ति से कोई तुम्हें पुकारे ,
          रो रो के नैना जब खो दूंगी ,
                              तुम्हें कैसे मैं देखूंगी,

यह जीवन मेरा,
           तेरे चरणों में ,
                    समर्पित है,
                           समर्पित है,

   रचनाकार का नाम ___निशि द्विवेदी

हाथ लगाकर मेहंदी इंतजार तुम्हारा है,

बनाकर मेहंदी का टैटू,
      इंतजार किया है तेरा,
             आओगे तुम कान्हा,
                    आवाज लगाई मैंने,

सोच रही हूं कान्हा,
      नाम लिखा लूं तेरा,
            पढ़ने आओगे तुम, 
                    विश्वास यह है हमारा,

सोच रही हूं कान्हा,
      वृंदावन लिखवा डालू,
              निवास वही तुम्हारा,
                         जल्दी आ जाओगे,

बैठे-बैठे रटती हूं,
    राधे का नाम प्यारा,
        नाम यह तुम्हें प्यारा,
             जल्दी आओगे तुम ,
                       विश्वास है हमारा,

तुम जितना मुझे प्यारे,
   दुनिया में कोई ना प्यारा,
              दिल की दीवारों पर,
                    नाम गूंजे है तुम्हारा,

तेरी एक झलक पाने को,
    मन करता है अभिलाषा,
         सपनों में ही आओ तुम,
               बन जाओ मेरा सहारा,

 मृगनैनी राधा संग,
         ठाढे हैं कन्हाई,
            मोर पंख लगा सर ,
                      बंसी रहे बजाएं,
 
कान्हा तेरे इंतजार में,
       भक्ति की परीक्षा में,
                हाथ सजाए बैठी,
                   बैठी___ निशि दिवेदी,

Friday, 31 July 2020

ओ री सखी मैं भी तेरे जैसी होली,

ओ री सखी वह गुजरा जमाना,
क्लास में पीछे बैठकर बतियाना,
साथ बैठ लेक्चर मिस करना,

तेरी कोयल सी मीठी मीठी बोली,
 साथ इमली की खट्टी मीठी गोली,
दोनों की चीजें सेम टू सेम होती,

वह तेरा इंतजार कराना ,
फिर होता था रूठना मनाना,
तेरा मुझ पर हुकुम चलाना,

ओ री सखी कॉलेज का नजारा,
 हाथ लगा खुशियों का पिटारा,
मानो जैसे कुबेर का खजाना,

बड़ा प्यारा था साथ तुम्हारा,
 रिमझिम बरसात का फुआरा,
एक छतरी में दोनों का आना,

ओ री सखी सर्दी का सितम,
कैंटीन के वह गरम समोसे,
 ठंडी उंगलि तेरे गालों को नोचे

ओ री सखी समय निकालो ,
एक बार इसे दोहरा डालो,
साथ बैठ पकौड़े खा लो,

             नाम____निशि दि्वेदी

बहू बेटी में फर्क

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
सारा प्यार मेरा वह पाएगी,
मेरे घर पर हुकुम चलाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी ,
बेटियां तो आती है जाने के लिए,
 बहु इस घर को अपना बनाएगी।

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कहलाएगी ,
 मेरे आंखों की चमक बढ़ाएंगी ,
मेरा समय वह मुझे याद दिलाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
जो नहीं मिला मुझे, उसे वह पाएगी,
सारी कहावतें वह झूठलाएगी,


मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
फिर से मेरा बचपन लौटाएगी,
मेरे वंश को आगे बढ़ाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी ,
बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी ,
मेरे बेटे को दूर ना ले जा पाएगी ,
इतना प्यार यहां वह पाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी ,
बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
इस घर की रौनक वह बढ़ाएगी,
दिलों में सबसे ऊंचा स्थान पाएगी,

मेरी बेटी भी किसी के घर जाएगी,
बेटी नहीं वहां बहू कह लाएगी,
संस्कारों को दहेज में ले जाएगी
उस कुल का मान बढ़ायागी,

Wednesday, 22 July 2020

कान्हा तेरे प्यार में

कान्हा मेरो रसिया,

मेरो मन बसिया,

छोरो ब्रिज को बड़ों निरालो,

कोई इसको अपना बना लो,

सूरत से बड़ों भोलो भालो,

राधा को प्रिय मोहन नाम वालो,

मोरे नैनन में बसी छवि वालों,

 निशि कृष्ण नैनन में बसो सदा बसो,

Saturday, 11 July 2020

क्या कमी है प्यार में मेरे,

नाम____  नििििििश द्विवेदीी

क्या कमी है प्यार में मेरे,
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क्या कमी है प्यार में मेरे,
आजकल आते नहीं क्यों ख्वाब में मेरे,
चाहा था तुम्हें इतना कोई चाह न सके जितना,
फिर भी दिल जलाते हो मेरा,
रूप तुम्हारा लगे निराला,
 फिर भी हृदय में बस आते नहीं हो,
क्या खता हमसे हुई है आज बता दो,
 कभी तो अपने नैनों में बसा लो,
जब आती हूं दर तुम्हारे ,
तुम मुझे देखते ही नहीं हो,
 कभी तो अपने आंखों के दर्पण में,
 मुझे मेरा चेहरा दिखा दो,
सब पर दया करी है तुमने ,
मुझ पर भी अपनी दया दिखा दो,

Friday, 3 July 2020

नारी का सम्मान करो , मत उसका अपमान करो।

नारी का हमारे जीवन में विशेष योगदान है हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी की हाथ होता है सदियों से ऐसा होता है आगे भी होता रहेगा हमारी आज  की कविता  का टॉपिक है नारी।

पुरुष की हर सफलता में, 
                                 नारी की कहानी है।

यह  नारी की  कहानी  है,
                                  बस मेरी जुबानी है।

पिया के साथ जो है साख पर बैठी,
               है तिनका तिनका पर हक जिनका,

अपनी पहचान को खोकर ,
                              नई पहचान बनाती है।

विशाल वृक्ष को बनाने,
                              के लिए बीज मरता है।

                 नाम____निशि द्विवेदी

सफलता की कहानी है नारी।

पुरुष बड़ा महान है,
                           फिर भी नारी का सम्मान है।

 पुरुष विशाल पर्वत के समान है ,
                              नारी ममता की दुकान है।

पुरुष कठोरता और,
                        नारी कोमलता की पहचान है।

पुरुष चलने का नाम है ,
                               और नारी पूर्ण विराम है।

पुरुष  पृथ्वी का सम्राट है,
                             फिर भी नारी का गुलाम है।

क्योंकि नारी  प्रसन्न है तो तुम पर वारि है।
और अगर नाराज है तो तुम पर भारी है।।

पुरुष पर नारी प्रसन्न है,
                              तो जीवन में हरियाली है।।

पुरुष से नारी नाराज तो ,
                                अधिकारी काली रात है।।

 पुरुषों अगर रहना हो चंगा,
                                 तो मत लेना नारी से पंगा।

                                 नाम____निशि दि्वेदी

Thursday, 2 July 2020

गुलाबी बादलों की छटा निराली।

 बहुत अच्छा था बादलों को कुछ नए रंगों में देखा बहुत अच्छा लगा इसलिए मैंने एक तस्वीर खींच ली मन मुताबिक आज बादलों पर कुछ लिखने की इच्छा हो गई है।
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गुलाबी बादल,
         जो मैंने देखा,
                 मन मेरा पागल मचल गया।
रंग-बिरंगे,
       बादलों में ,
           ❤️ दिल मेरा प्यारा मचल गया।

चारों दिशाओं में,
         नजर घुमाई तो,
                दिल से वाह वाह निकल गया।

आसमानी से,
       हुआ गुलाबी ,
                  देखो रंग कैसा निखर गया।

क्षण में लगता,
       धुआं धुआं सा ,
                    छड़ में देखो शिखर लगा।

निरंतर बदलता,
            ही है रहता,
                    इस पल में देखो क्या लगा।

उदास आंखें थी,
          कुछ पहले तक,
                देख कर मन मेरा मचल गया।

आसमानों में ,
           टिक गई आंखें ,
                        प्रकृति से  लव हो गया।

कैसा खुशनुमा सा,
            हुआ है मौसम,
                  दिल चिड़िया सा चहक गया।

छटा निराली,
         होती बादलों की ,
                      निराला मौसम लगने लगा।

                             नाम____निशि द्विवेदी

ना था मंजूर दिल देना,

नहीं था दूर का रिश्ता,
                     कोई अपना नहीं थे तुम,

बड़ा महंगा पड़ा था इश्क, 
                       मेरा सपना हुए थे तुम,

हर पल मुस्कुराती थी,
                  रो कर तकिया भिगाती थी,

दिल में महसूस करती थी ,
                     कुछ ना मुंह से कहती थी,

बड़ा महंगा पड़ा था इश्क ,
                           मेरा सपना हुए थे तुम,

ना दिखते थे तुम सामने ,
                       तुम्हें ही ढूंढती रहती थी,

समंदर तुमको माना था,
                         बनी नदियां तुम्हारी थी ,

तुझे अपना समझती थी,
                         मेरा अपना नहीं थी तुम,

लगाकर मोबाइल में फोटो,
                         उसे बस जूम करती थी,

बड़ा कमजोर था इश्क़,
                           उसे सबसे छुपाती थी,

तुम्हें अपना समझती थी, 
                            मेरा अपना नहीं थे तुम,

छुपाकर तकिए में फोटो,
                       तेरे ख़्वाबों को बुनती थीं,

करके बंद आंखों को,
                            बस जागती रहती थी,

तुम हकीकत ना बन पाए,
                      मेरा सपना ही रह गए तुम,

                            नाम___ निशि द्विवेदी 

 

Wednesday, 1 July 2020

खुशी का हर रंग तुम्हारे संग संग हो।

अगर जिंदगी हो,
                   तेरे संग संग  हो,

अगर मोहब्बत हो,
                    तेरे संग संग हो,

जिंदगी का हर रंग,
                     तेरे संग संग हो,

जिंदगी की हर जंग में,
                     तुम् संग संग हो,

जिंदगी की फुलवारी में,
                 तुम हम सदा संग हो,

फर्क सिर्फ इतना हो,
                      गुलाब तेरे संग हो,

और सारे कांटे,
                 मेरे संग हो,

निशा का हर पहर,
                  तुम्हारे संग संग हो,

दिन के उजाले में भी,
                     तुम्हारा संग संग हो,

भंग कभी ना हो,
                सदा तुम्हारा संग संग हो,

भांग का तरंग हो,          
                    जब तुम संग संग हो,
  
                               नाम____ निशि द्विवेदी

खोने का डर

जितनी शिद्दत तुम्हें पाने की थी                 उससे ज्यादा डर तुम्हें खोने का है बस यही है कि तुमसे लड़ती नहीं           तुम यह ना समझना कि...