Monday, 31 August 2020

नीतिपरक और सच्ची बातें बच्चों को बताई रखिए।

देश प्रेम दिल में जगाई रखिए,
   राष्ट्रहित में कलाम लिखाई रखिए,
       राष्ट्रगान में तन सावधान बनाई रखिए,

चापलूसो से जुदाई रखिए,
    हितैषीयो से मिलाई रखिए,
        ईश्वर से सत्य की सदैव दुहाई रखिए,

प्रभु को मन बसाई रखिए,
     घर में कुछ दवाई रखिए,
           चिंतन मनन के लिए तन्हाई रखिए,

घर में कभी ना जमाई रखिए,
   मन में सदैव समाई रखिए,
      जीवन में मौज मस्ती और घुमाई रखिए,

छुपा कर अपनी कमाई रखिए,
   सत्य की अलख जगाई रखिए,
        मेरा तेरा ना करना  सदैव हमाई रखिए,

भजनों में मन रमाई रखिए,
     पुत्री को घर पर दबाई रखिए,
          लक्ष्मी को घर में सब से छुपाई रखिए,

स्वभाव अपना सहाई रखिए,
     पुलिस को  खवाई रखिए,
         घर को सदा साफ सुथरा सुहाई रखिए,

शत्रु को सदा हराई रखिए,
    बातों में अपनी दमाई रखिए,
       किसी के घर जाए तो हाथ में मिठाई रखिए,

दूध में मलाई रखिए,
     जल को हलाई रखिए,
            लेन-देन में हमेशा-हमेशा सफाई रखिए,

बुराइयों को उड़ाई रखिए,
     अच्छाइयों को छुपाई रखिए,
            रिश्तेदारों से लेनदेन सदैव बचाई रखिए,

चटनी में थोड़ी खटाई रखिए,
      सुख दुख में सदैव समाई रखिए,
            हरियाली देश में बहुत बहुत बढ़ाई रखिए,

दीन हीनो पर दया बनाई रखिए,
      पशु प्रेम दिल में जगाई रखिए,
             समय पर इनकी खिलाई ,पिलाई रखिए,

सेवक को चार बातें सुनाई रखिए,
     सहायता भरपूर कराई रखिए,
             सभी से मित्रवत मिलाई, जुलाई रखिए,

मुख को गर्म से बचाई रखिए,
    नेत्रों को चमक से बचाई रखिए,
           मादक पदार्थों के सेवन से बचाई रखिए,

(स्वरचित)
 रचनाकार का नाम____निशि द्विवेदी
                                  (पिंकी दिवेदी)

Sunday, 30 August 2020

दर्पण कहे श्रंगार कर आंखें काली रखें,

गुरु कहे लिखना जारी रखें,

  ससुर कहे बहू चाय की प्याली रखें,

        पति कहे थाली में व्यंजन चारी रखें,

                   सास कहे बहू अचारी रखें,

              घर की साज-सज्जा जारी रखें,
            
समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,


मेहमान कहे शिष्टाचार ही रखें,

   फॉलोवर्स कहे कविता जारी रखें,

      प्रकृति कहे घर में हरियाली रखें,

          सांझ,सवेरे घर के मंदिर में दियाली रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,


घर कहे कूड़े को बाहरी रखें,

    परिजन का पूरा ख्याली रखें,
    
        भिखारी कहे दान पुन जारी रखें,

                दर्पण कहे थोड़ा श्रंगारी रखें,

       अखियां कारी और होठों पर लाली रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,

गाड़ी कहे मुझ पर सवारी रखें,

पड़ोसन कहे सखी व्यवहारी रखें,

     सखियां कहे गुफ्तगू जारी रखें,

        पार्टियां कहे  बनारसी साड़ी रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें,

दिन के सारे काम कर ,
   रात में बैठी लिखने को ,
       बच्चे बोले ओ कवित्री मां,
              कमरे में अधिआरी रखें,

समझ ना आए कैसे हम कविता लिखना जारी रखें।
कोई बताए कैसे हम कविता लिखना जारी रखे।।
😱
(स्वरचित )रचनाकार का नाम ____निशी दिवेदी

Friday, 28 August 2020

तुमको ना भूल पाएंगे,

चांद मुझे बहुत प्यारा था,
 चांद पर बसने का शौक निराला था,

  बहनों ने मुझे चांद पुकारा था,
चांद पर जाने का सपना बड़ा पुराना था,

चांद के जैसा मैंने भी चकोर को चाहा था,
मुझे उसकी उसे मेरी दौलत की चाहत थी,

मैं इस बात से अंजान था ,
मैं उस रात से अंजान था,

जब दर्द से तड़प रहा था,
 चाहत मेरे सामने रही होगी,

सुना है इंसानियत का रिश्ता,
 हर रिश्ते में अपना भाई अपना बेटा ,

ढुंढ ही लेता है,
तो क्या उसका?????? 

लोग मुझे जब मार रहे होंगे,
 हाथापाई तो हुई होगी ,

मैं  चीख, चिल्ला रहा हूंगा,
मैं तड़पा भी ,रोया भी हूं गा ,

मेरे गले में फंदा डाल रहे थे ,
अपराधी मुझको मार रहे थे,

मदद के लिए पुकारा तो होगा,
 तड़पता रहा हूं गा,

कितना संघर्षशील जीवन था मेरा ,
आखरी सांस तक मैं लड़ा तो हूगा।

कितनी निर्दई थी वो आंखें ,जिन्हें दया नहीं आई।
सारे छूट गए वही मेरे अपने, हाथ में तन्हाई आई।।

      स्वरचित रचनाकार का नाम ____निशि द्विवेदी
                                                  ( पिंकी द्विवेदी)  

Thursday, 27 August 2020

रिया को मत होने देना रिहा।।

मेरी यह कविता सुशांत सिंह राजपूत को न्याय दिलाने की एक कोशिश है।
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  मेरा रूठ गया है सपना ।
  मेरा रूठ गया कोई अपना।

रेत की तरह कोई मुट्ठी से फिसल गया है।
मेरा अपना कोई मुझे तन्हा कर गया है।

दिल के आशियाने में बिठाया था मैंने।
वही मुझे कुचलकर निकल गया है।

तिनको को चुन चुन कर महल बनाया था।
दिल के फ्रेम में उसका फोटो भी लगाया था।।

लहर की तरह आया,  और बिखरा कर चल दिया।
आज मेरा दिल❤️ तिनको में बिखरा पड़ा है।

वादा किया था मैंने ,कि सफर के साथी बनेंगे।
चंद सिक्कों के लिए मुझे छोड़ कर चल दिए।।

कैसे बताऊं मैं ,कैसे तुम्हें जताऊं।
हाथ पैर दीवारों पर  पटक रहा हूं।।

चीख चीख कर पुकारू मैं नाम तुम्हारा।
दिल में लिखे नाम को आंसुओं से धो रहा हूं।।

मैं कैसे इसे समझाऊं मैं कैसे तुझे भुलाऊं।
जितना भुलाना चाहा, तू उतना रुलाती है।।

किस्मत वालों के हाथ में होती है वह लकीरे।
मेरे दिल में चुभती है तेरे नाम की लकीर ।।

तन्हा अकेला कर दिया जिंदगी की राहों में।
आज  बैठकर समुंदर के किनारे रो रहा हूं।।

चंद सिक्कों के लिए तूने मेरा प्यार ठुकराया
क्या वह सिक्के वह प्यार दे पाएंगे जो मैंने दिया।।

तेरी मासूमियत देख मैंने दुनिया छोड़ी।
तुझे मेरी मोहब्बत रास नहीं आई।।

कहते हैं मोहब्बत एक तरफा नहीं होती।
मैंने दिल से चाहा था , मुझे सजा मिली।।

सुशांत को मिटाया तू भी अशांत रहेगी।
रिया नाम था तेरा तू भी रिहा नहीं होगी।।

स्वरचित रचनाकार का नाम ____निशि दिवेदी

कोई लौटा दे मेरा बचपन।

आया सावन मनभावन।
      कर दे रोम रोम पावन।।
         कर दे वारि तन मन धन।
              कोई लौटा दे मेरा बचपन।।

जब से रूठा है बचपन।
    तब से देख रही दर्पण।।
          छुटा दौर खिलौनों का।
               पांव दहलीज के यौवन।।

जब से यौवन है आया।
    तब से उमंग है छाया।।
         नई तरंग मन भाया।
              नयन देख रहे दिवास्वप्न।।

एक दौर था यौवन का।
    नया पड़ाव है जीवन का।।
        बचपन याद बहुत आया।
               बचपन मस्त बहुत पाया।।

अभावग्रस्त था बचपन।
  कष्ट तनिक नहीं था बचपन।।
    जल्द आएगा दौर पचपन।
     कोई लौटा दे मेरा फिर से बचपन।।
     
   रचनाकार का नाम ____निशि दिवेदी 


Thursday, 20 August 2020

नारी का सम्मान करो।

ओम नमो नारायणा,
     नमः नारी नारायणी। 
         पृथम देव दयावान, 
            द्वतिय नारी कृपायनि,।।

 देव विराजे स्वर्ग धाम,
     नारी आधार धरा की।
          देवों की सर्व श्रेष्ठ कला ,
                नारी उपहार धरा की।।

पुरूष दुःखी थे बिन नारी,
  सात रंगों से सराबोर थी नारी,
       रूप लावण्य से युक्त नारी,
              सभी दुखों से मुक्ति नारी,

घनघोर घटा से केश थे काले,
     नीले नयन थे बड़े निराले,
         सुर्ख लाल होंठों की और,
              सुनहरी मुस्कान चेहरे की,

चन्द्रमा सी सुंदर काया,
    सूरज सा तेज ललाट,
         भुजाएं थीं लताऐं सी,
            मदमस्त हिरनी सी चाल,

कोयल सी मीठी बोली,
   लगे मोहिनी सी मुस्कान,
       मोती से थे दमक रहे दांत,
            फूलों सी कोमल मन वाली,

सुन्दर गहनों से लदी थी,
   श्रृंगार करे सजी धजी थी,
        नीले वस्त्र पहन रखी थी,
           घुनधाट निकाले खड़ी थी,

जो करें सम्मान नारी का,
     प्रभू प्रेम का अधिकारी है,
             नारी देवी का रूप है,
                   प्यार की प्रति मूर्ति है,

नारी का सम्मान करो,
    मत उसका अपमान करो,
                     नारी है अपराजिता,
               


                रचनाकार का नाम____निशि द्विवेदी

Sunday, 16 August 2020

कटु परंतु सत्य


                                       नाम ____निशि दि्वेदी 
            (पिंकी द्विवेदी)
 
उड़ती पतंग सा होता जीवन,
        तंग डोर में तनाव सा जीवन,
            ढीली डोर से बढ़ता जीवन,
                  जीवन साथी संग हाथ ,
                       पकड़ कर चलता जीवन,

साथ छूटे तो कटी ,
    पतंग सा गिरता जीवन,
          साथी सही तो मस्त ,
                पतंग सा उड़ता जीवन,

डोर गलत हाथों में ,
      तो ढलता जीवन,
         जिधर हवा का रुख ,
                 उधर हो लेता जीवन,

कामयाबी की सीढ़ी पकड़,
        कर चढ जाता जीवन ,
                डालकर लंगर उसे,
                          गिरा देता दुश्मन,

सुमति से ,
        चले तो चलता जीवन,
       कुमति से,
              कटी धरा पर गिरता जीवन,

पतंग के जैसा होता जीवन,
      तरह तरह की पतंगों सा,
           अनेक तरह का होता जीवन,
                     दिशा एक है ,
             अनेक राहों में चलता जीवन,

कौन घड़ी किस दिशा में जाएगा जीवन,
कौन घड़ी किस दिशा में पूरा होगा जीवन,

                          नाम ____निशि द्विवेदी

Tuesday, 11 August 2020

प्रकृति का राज ना जाने पावे , चाहे जितना विज्ञान पढ़ आवै,



कितना ज्यादा बरसा पानी ,
बड़े जोर से बरसा पानी,

 रात रात भर बरसा पानी,
झम झम झम झम बरसा पानी ,

भर गई नदियां भर गई नाले,
 भर गए तालाब और शिवाले ,

मेरे घर के आंगन में भी
 आज थोड़ा भर गया पानी,

बड़ी जोर से बरसा पानी,
 चम चम चम चम बिजली चमकी

 गढ़ गढ़ गढ़ गढ़ बादल गरजे 
और रात भर बरसा पानी 

मेरे घर आंगन में भी
 आज झमक के  बरसा पानी,

बड़ी जोर से बरसा पानी,
प्रकृति के खेल भी बड़े निराले,

 कहीं खिली धूप कहीं पर सूखे,
 और कहीं पर बरसा पानी,

कभी-कभी तो ऐसा होता 
काली घटा अजब छा जाती,

 और जोर से आंधी आती,
बादलों को उड़ा ले जाती,

कड़क कड़क कर बिजली चमकी,
 कड़क कड़क के बादल गरजे,

धरती फिर भी सूखी रह जाती,
प्यास धारा की बुझ ना पाती,

कभी-कभी तो दिल को,
 दर्द का एहसास करा जाता पानी,

गरज गरज कर रोता बादल,
आंसुओं से झड़ी सा बरसा पानी,

मानो दिल चीर कर दिखाता बादल,
आंसू गिराकर दर्द का एहसास दिखाता बादल,

और कभी आनंदित होकर,
झूम झूम कर नाच दिखाता बादल,

कभी आस्था का प्रतीक बन जाता बादल,
सावन की बरसे बदरिया मां की भीगे चुनरिया,

 नवरात्रि में फुहार बरसता बादल,
आस्था विश्वास जगाता बादल,

तानसेन के रागमल्हार पर झूम झूमकर बरसे ,
कभी-कभी तो प्यासी धरती बूंद बूंद को तरसे,

वर्षा का वजूद है बड़ा लुभावना ,
महीने भर बरस कर धरती हरियाली बड़ा जाते,

पूरे बस हरियाली जिस से वंचित रह जाती ,
जबकि यही का जल उठा कर दोबारा बरसाता पानी,

प्रकृति का राज नहीं कोई जाने,
मानव कितना विज्ञान पढ़ जावे,

                                नाम____निशि दि्वेदी




 

Saturday, 1 August 2020

नहीं भाता कोई चेहरा,

नहीं भाता कोई चेहरा,
       तुझे पाना मजबूरी है,
             ठहरती कहीं नहीं आंखें,
                       तेरा मिलना जरूरी है,

कान्हा अब चले आओ,
         तेरा आना जरूरी है,
               तेरे मंदिर में मेरा आना ,
                        तेरी मूरत में समा जाना,

तेरी सूरत में जो आंखें,
     उन आंखों में ही खो जाना,
             दिखे पुतली में तेरा चेहरा,
                      नहीं कुछ भी नजर आता,

लगा चस्का जब से तेरा,
   कुछ और मुझे नहीं भाता,
        बस याद मुझे है कृष्ण राधा,
              अलावा इसके कुछ नहीं भाता,

सुना है तुम चले आते ,
    भक्ति से कोई तुम्हें पुकारे ,
          रो रो के नैना जब खो दूंगी ,
                              तुम्हें कैसे मैं देखूंगी,

यह जीवन मेरा,
           तेरे चरणों में ,
                    समर्पित है,
                           समर्पित है,

   रचनाकार का नाम ___निशि द्विवेदी

हाथ लगाकर मेहंदी इंतजार तुम्हारा है,

बनाकर मेहंदी का टैटू,
      इंतजार किया है तेरा,
             आओगे तुम कान्हा,
                    आवाज लगाई मैंने,

सोच रही हूं कान्हा,
      नाम लिखा लूं तेरा,
            पढ़ने आओगे तुम, 
                    विश्वास यह है हमारा,

सोच रही हूं कान्हा,
      वृंदावन लिखवा डालू,
              निवास वही तुम्हारा,
                         जल्दी आ जाओगे,

बैठे-बैठे रटती हूं,
    राधे का नाम प्यारा,
        नाम यह तुम्हें प्यारा,
             जल्दी आओगे तुम ,
                       विश्वास है हमारा,

तुम जितना मुझे प्यारे,
   दुनिया में कोई ना प्यारा,
              दिल की दीवारों पर,
                    नाम गूंजे है तुम्हारा,

तेरी एक झलक पाने को,
    मन करता है अभिलाषा,
         सपनों में ही आओ तुम,
               बन जाओ मेरा सहारा,

 मृगनैनी राधा संग,
         ठाढे हैं कन्हाई,
            मोर पंख लगा सर ,
                      बंसी रहे बजाएं,
 
कान्हा तेरे इंतजार में,
       भक्ति की परीक्षा में,
                हाथ सजाए बैठी,
                   बैठी___ निशि दिवेदी,

Friday, 31 July 2020

ओ री सखी मैं भी तेरे जैसी होली,

ओ री सखी वह गुजरा जमाना,
क्लास में पीछे बैठकर बतियाना,
साथ बैठ लेक्चर मिस करना,

तेरी कोयल सी मीठी मीठी बोली,
 साथ इमली की खट्टी मीठी गोली,
दोनों की चीजें सेम टू सेम होती,

वह तेरा इंतजार कराना ,
फिर होता था रूठना मनाना,
तेरा मुझ पर हुकुम चलाना,

ओ री सखी कॉलेज का नजारा,
 हाथ लगा खुशियों का पिटारा,
मानो जैसे कुबेर का खजाना,

बड़ा प्यारा था साथ तुम्हारा,
 रिमझिम बरसात का फुआरा,
एक छतरी में दोनों का आना,

ओ री सखी सर्दी का सितम,
कैंटीन के वह गरम समोसे,
 ठंडी उंगलि तेरे गालों को नोचे

ओ री सखी समय निकालो ,
एक बार इसे दोहरा डालो,
साथ बैठ पकौड़े खा लो,

             नाम____निशि दि्वेदी

बहू बेटी में फर्क

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
सारा प्यार मेरा वह पाएगी,
मेरे घर पर हुकुम चलाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी ,
बेटियां तो आती है जाने के लिए,
 बहु इस घर को अपना बनाएगी।

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कहलाएगी ,
 मेरे आंखों की चमक बढ़ाएंगी ,
मेरा समय वह मुझे याद दिलाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
जो नहीं मिला मुझे, उसे वह पाएगी,
सारी कहावतें वह झूठलाएगी,


मेरे घर किसी की बेटी आएगी,
 बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
फिर से मेरा बचपन लौटाएगी,
मेरे वंश को आगे बढ़ाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी ,
बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी ,
मेरे बेटे को दूर ना ले जा पाएगी ,
इतना प्यार यहां वह पाएगी,

मेरे घर किसी की बेटी आएगी ,
बेटी नहीं वह बहू कह लाएगी,
इस घर की रौनक वह बढ़ाएगी,
दिलों में सबसे ऊंचा स्थान पाएगी,

मेरी बेटी भी किसी के घर जाएगी,
बेटी नहीं वहां बहू कह लाएगी,
संस्कारों को दहेज में ले जाएगी
उस कुल का मान बढ़ायागी,

Wednesday, 22 July 2020

कान्हा तेरे प्यार में

कान्हा मेरो रसिया,

मेरो मन बसिया,

छोरो ब्रिज को बड़ों निरालो,

कोई इसको अपना बना लो,

सूरत से बड़ों भोलो भालो,

राधा को प्रिय मोहन नाम वालो,

मोरे नैनन में बसी छवि वालों,

 निशि कृष्ण नैनन में बसो सदा बसो,

Saturday, 11 July 2020

क्या कमी है प्यार में मेरे,

नाम____  नििििििश द्विवेदीी

क्या कमी है प्यार में मेरे,
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क्या कमी है प्यार में मेरे,
आजकल आते नहीं क्यों ख्वाब में मेरे,
चाहा था तुम्हें इतना कोई चाह न सके जितना,
फिर भी दिल जलाते हो मेरा,
रूप तुम्हारा लगे निराला,
 फिर भी हृदय में बस आते नहीं हो,
क्या खता हमसे हुई है आज बता दो,
 कभी तो अपने नैनों में बसा लो,
जब आती हूं दर तुम्हारे ,
तुम मुझे देखते ही नहीं हो,
 कभी तो अपने आंखों के दर्पण में,
 मुझे मेरा चेहरा दिखा दो,
सब पर दया करी है तुमने ,
मुझ पर भी अपनी दया दिखा दो,

Friday, 3 July 2020

नारी का सम्मान करो , मत उसका अपमान करो।

नारी का हमारे जीवन में विशेष योगदान है हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी की हाथ होता है सदियों से ऐसा होता है आगे भी होता रहेगा हमारी आज  की कविता  का टॉपिक है नारी।

पुरुष की हर सफलता में, 
                                 नारी की कहानी है।

यह  नारी की  कहानी  है,
                                  बस मेरी जुबानी है।

पिया के साथ जो है साख पर बैठी,
               है तिनका तिनका पर हक जिनका,

अपनी पहचान को खोकर ,
                              नई पहचान बनाती है।

विशाल वृक्ष को बनाने,
                              के लिए बीज मरता है।

                 नाम____निशि द्विवेदी

सफलता की कहानी है नारी।

पुरुष बड़ा महान है,
                           फिर भी नारी का सम्मान है।

 पुरुष विशाल पर्वत के समान है ,
                              नारी ममता की दुकान है।

पुरुष कठोरता और,
                        नारी कोमलता की पहचान है।

पुरुष चलने का नाम है ,
                               और नारी पूर्ण विराम है।

पुरुष  पृथ्वी का सम्राट है,
                             फिर भी नारी का गुलाम है।

क्योंकि नारी  प्रसन्न है तो तुम पर वारि है।
और अगर नाराज है तो तुम पर भारी है।।

पुरुष पर नारी प्रसन्न है,
                              तो जीवन में हरियाली है।।

पुरुष से नारी नाराज तो ,
                                अधिकारी काली रात है।।

 पुरुषों अगर रहना हो चंगा,
                                 तो मत लेना नारी से पंगा।

                                 नाम____निशि दि्वेदी

Thursday, 2 July 2020

गुलाबी बादलों की छटा निराली।

 बहुत अच्छा था बादलों को कुछ नए रंगों में देखा बहुत अच्छा लगा इसलिए मैंने एक तस्वीर खींच ली मन मुताबिक आज बादलों पर कुछ लिखने की इच्छा हो गई है।
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गुलाबी बादल,
         जो मैंने देखा,
                 मन मेरा पागल मचल गया।
रंग-बिरंगे,
       बादलों में ,
           ❤️ दिल मेरा प्यारा मचल गया।

चारों दिशाओं में,
         नजर घुमाई तो,
                दिल से वाह वाह निकल गया।

आसमानी से,
       हुआ गुलाबी ,
                  देखो रंग कैसा निखर गया।

क्षण में लगता,
       धुआं धुआं सा ,
                    छड़ में देखो शिखर लगा।

निरंतर बदलता,
            ही है रहता,
                    इस पल में देखो क्या लगा।

उदास आंखें थी,
          कुछ पहले तक,
                देख कर मन मेरा मचल गया।

आसमानों में ,
           टिक गई आंखें ,
                        प्रकृति से  लव हो गया।

कैसा खुशनुमा सा,
            हुआ है मौसम,
                  दिल चिड़िया सा चहक गया।

छटा निराली,
         होती बादलों की ,
                      निराला मौसम लगने लगा।

                             नाम____निशि द्विवेदी

ना था मंजूर दिल देना,

नहीं था दूर का रिश्ता,
                     कोई अपना नहीं थे तुम,

बड़ा महंगा पड़ा था इश्क, 
                       मेरा सपना हुए थे तुम,

हर पल मुस्कुराती थी,
                  रो कर तकिया भिगाती थी,

दिल में महसूस करती थी ,
                     कुछ ना मुंह से कहती थी,

बड़ा महंगा पड़ा था इश्क ,
                           मेरा सपना हुए थे तुम,

ना दिखते थे तुम सामने ,
                       तुम्हें ही ढूंढती रहती थी,

समंदर तुमको माना था,
                         बनी नदियां तुम्हारी थी ,

तुझे अपना समझती थी,
                         मेरा अपना नहीं थी तुम,

लगाकर मोबाइल में फोटो,
                         उसे बस जूम करती थी,

बड़ा कमजोर था इश्क़,
                           उसे सबसे छुपाती थी,

तुम्हें अपना समझती थी, 
                            मेरा अपना नहीं थे तुम,

छुपाकर तकिए में फोटो,
                       तेरे ख़्वाबों को बुनती थीं,

करके बंद आंखों को,
                            बस जागती रहती थी,

तुम हकीकत ना बन पाए,
                      मेरा सपना ही रह गए तुम,

                            नाम___ निशि द्विवेदी 

 

Wednesday, 1 July 2020

खुशी का हर रंग तुम्हारे संग संग हो।

अगर जिंदगी हो,
                   तेरे संग संग  हो,

अगर मोहब्बत हो,
                    तेरे संग संग हो,

जिंदगी का हर रंग,
                     तेरे संग संग हो,

जिंदगी की हर जंग में,
                     तुम् संग संग हो,

जिंदगी की फुलवारी में,
                 तुम हम सदा संग हो,

फर्क सिर्फ इतना हो,
                      गुलाब तेरे संग हो,

और सारे कांटे,
                 मेरे संग हो,

निशा का हर पहर,
                  तुम्हारे संग संग हो,

दिन के उजाले में भी,
                     तुम्हारा संग संग हो,

भंग कभी ना हो,
                सदा तुम्हारा संग संग हो,

भांग का तरंग हो,          
                    जब तुम संग संग हो,
  
                               नाम____ निशि द्विवेदी

Tuesday, 30 June 2020

गुलाबी बादलों की छटा निराली।

 बहुत अच्छा था बादलों को कुछ नए रंगों में देखा बहुत अच्छा लगा इसलिए मैंने एक तस्वीर खींच ली मन मुताबिक आज बादलों पर कुछ लिखने की इच्छा हो गई है।
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गुलाबी बादल,
         जो मैंने देखा,
                 मन मेरा पागल मचल गया।
रंग-बिरंगे,
       बादलों में ,
           ❤️ दिल मेरा प्यारा मचल गया।

चारों दिशाओं में,
         नजर घुमाई तो,
                दिल से वाह वाह निकल गया।

आसमानी से,
       हुआ गुलाबी ,
                  देखो रंग कैसा निखर गया।

क्षण में लगता,
       धुआं धुआं सा ,
                    छड़ में देखो शिखर लगा।

निरंतर बदलता,
            ही है रहता,
                    इस पल में देखो क्या लगा।

उदास आंखें थी,
          कुछ पहले तक,
                देख कर मन मेरा मचल गया।

आसमानों में ,
           टिक गई आंखें ,
                        प्रकृति से  लव हो गया।

कैसा खुशनुमा सा,
            हुआ है मौसम,
                  दिल चिड़िया सा चहक गया।

छटा निराली,
         होती बादलों की ,
                      निराला मौसम लगने लगा।

                             नाम____निशि द्विवेदी

Saturday, 27 June 2020

आसू गिरे लोग कहे, मूसलाधार बरसात हुई।


 
सावन में जब दिल टूटा,
      कोई अपना मुझसे रूठा,
             हम रोते रहे लोग सोचे बरसात हुई,
                      उनसे वही आखरी मुलाकात हुई।

गरीब कहकर छोड़ गए ,
           जो मेरे सबसे करीब थे,
                     आंसू बरसाती पानी लगे,
                                  आंसू बड़े बदनसीब थे,
  
क्यों खाई थी कसमे,
           क्यों तोड़ी थी रश्मे,
                      जो किए थे वादे,
                             भूल गए जो थे मेरे अपने।

 ना जाने कब सुबह हुई ,
         फिर ना जाने कब शाम हुई,
                 फिर ना जाने कब दिन हुई,
                            फिर ना जाने कब रात हुई,

 मोहब्बत मेरी बरबाद हुई,
      प्रारब्ध था या कोई था हमला,
          आंखो से टप टप बह रहे थे मोती,
             लोग कह रहे थे मूसलाधार बरसात हुई।
     
   
नाम____निशि द्विवेदी
              (पिंकी द्विवेदी)


काली घटाओं ने किया मन बेकरार है।

ओओ यारा मेरे यार ने ,
     बस तेरे ही प्यार में,
          कितने सावन बरसे,
                  कितना है हम तरसे,

  मधुबन में बहार है,
        मुझको हुआ प्यार है।
                जब जब सावन बरसे
                       मन पिया मिलन को तरसे,

  बादलों में बौछार है ,
         वर्षा में झंकार है,
               सावन की फुहार है,
                         मुझको हुआ प्यार है।

   जब जब सावन बरसे,
           पिया मिलन को तरसे,
                    बन के मोरनी नाचे,
                             मन पीहू पीहू बोले,

तेरे प्यार का खुमार है।
      पाना बाहों का हार है।
           तेरे प्यार का सावन बरसे,
                  मन रिमझिम रिमझिम भीगे,

कलियों में निखार है,
       फूलों में बहार है,
             मुझको तुमसे प्यार है
                   हुआ दिल में मेरे एहसास है।


हम सोलह सावन तरसे
    यौवन सोलह श्रृंगार को तरसे,
          अखियां डब्लू डब्लू नाचे,
                 दिल जिग जैक जिक जैक गाय,


  बादलों में बौछार है ,
         वर्षा में झंकार है,
               सावन की फुहार है,
                         मुझको हुआ प्यार है।

   जब जब सावन बरसे,
           पिया मिलन को तरसे,
                    बन के मोरनी नाचे,
                             मन पीहू पीहू बोले,

तेरे प्यार का खुमार है।
      पाना बाहों का हार है।
           तेरे प्यार का सावन बरसे,
                  मन रिमझिम रिमझिम भीगे,

कलियों में निखार है,
       फूलों में बहार है,
             मुझको तुमसे प्यार है
                   हुआ दिल में मेरे एहसास है।


हम सोलह सावन तरसे
    यौवन सोलह श्रृंगार को तरसे,
          अखियां डब्लू डब्लू नाचे,
                 दिल जिग जैक जिक जैक गाय,

           नाम____निशि द्विवेदी
                        (पिंकी द्विवेदी)











Friday, 26 June 2020

श्री प्रभु के भक्तों का अंदाज निराला होता है,

प्रातः काल 4:00 से 5:00 के बीच में एक चिड़िया आती है हमारी छतों पर बैठकर एक मधुर आवाज में ....श्री प्रभु ....श्री प्रभु..... गुंजार करती है , उसकी मीठी सी  आवाज कानों में पड़ते ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है नींद तो टूट कर भाग जाती है मन आनंदित हो उठता है, आज मैं उन्हीं पलों को कविता के माध्यम से प्रस्तुत करती हूं।
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प्यारी प्यारी चिड़िया रानी ,
     कहा से तुम रोज आती हो,
            फिर कहां तुम चली जाती हो,
                      रहती कहां हो चिड़िया रानी।

पता तुम्हारा मुझे बता दो,
       एक झलक तुम मुझे दिखा दो,
                राज तुम्हारा मुझे बता दो,
                         रूप तुम्हारा मुझे दिखा दो।

सुबह-सुबह तुम रोज आती हो,
         एक नया  आनंद भर जाती हो,
                 श्री हरि ने जो काम दिया है,
                             इसे बखूबी निभाती हो।

इतनी मीठी आवाज तुम्हारी ,
      है अंदाज निराला बिल्कुल,
            उत्साह कितना भर देती हो,
                            प्रेरणा प्रभु की देती हो,

  श्री प्रभु के भक्तों का,
       अंदाज निराला होता है
           नहीं चिंता उन्हें किसी की,
                  जिनका प्रभु रखवाला होता है।

           रचनाकार का नाम___निशि द्विवेदी
                                          ( स्वरचित)

सच है या नैनों की साजिश कोई?

ओ कृष्णा बोलो ना,
            कुछ तुम कह दो ना,
                  कृष्णा बोलो ना,
                         मुंह तो खोलो ना,

   राधे सुन लो ना,
          लाज तुम छोड़ो ना,
                    आंखें खोलो ना,
                             मेरी तरफ देखो ना,

  यह हसीन वादियां,
           यह सावन की फुहार,
                    ये खुला आसमां,
               ‌‌               यह महकी सी हवा,

    ह्रदय बीच ज्योति जागे,
             एक तेरे नाम की,
                    लव जो ना कह सके,
                              आंखें वह कह देती हैं।

     ऊंचे पहाड़ों से ,
          एक बार राधा बोलो,
               बार बार राधा सुन लो ,
                    राधा तेरा नाम चारों दिशाओं गूंजे।

                                निशि द्विवेदी ( स्वरचित)_  

Thursday, 25 June 2020

अखियां में काजल ना लगवाए

 नाम____निशि द्विवेदी
लल्ला  रहे मैया को नचाय,
वह तो काजल ना लगवाए।।


कान्हा इत उत भागे जाए ,
    वह तो काजल ना लगवाए।
          मैया पीछे पीछे आए ,
              कान्हा को रही पास बुलाए।

        ईत्तो प्यारो मेरो लाल,
              लल्ला नजर तोह लग जाए।
                      काजल टीका लेव लगवाए।
                             तोहे माखन खूब खवाएं।

ना मैया मैं काजल ना लगवाऊ
     मेरे आंख में मिर्ची लग जाए।
             मेरी अखियां अश्रु बहाए।
                    मेरी अखियां बंद हुई हुई जाए।

दृष्टि तीव्र हो जाए,
      तुम काजल लो लगवाए, 
            यहीं बैठे बैठे राधा दिखाएं,
                     पहले काजल लो लगवाए,

 फिर लो माखन मिश्री खाए।
        लल्ला पूरे घर नाच नचाए ।
              वह तो काजल ना लगवाएं।


Monday, 22 June 2020

जय जय श्री राधे।

 नाम____निशि द्विवेदी

मिटेगी सारी बाधा गर बोलोगे राधा राधा।

है नई नवेली राधा रानी

 है छैल छबीली राधा रानी

 है  सपन सलोनी राधा रानी

है रासबिहारी राधा रानी

 है बड़ी मतवाली राधा रानी

 है हिम्मत वाली राधा रानी 

है सबकी प्यारी राधा रानी 

हमको प्यारी राधा रानी 

है तुमको प्यारी राधा रानी

पढ़ कर अपनी हाजिरी लगवाओ राधे राधे बोले जाओ।

अब नहीं है मुझे कोई बाधा ,
          मेरी जुबां पर नाम है राधा।

                     दिल में नहीं अब कोई प्रश्न ,
                              क्योंकि मेरे साथ है सदा कृष्ण।

अब क्यों नहीं होती है आंखों में नमी।
       क्यों हो रही है ग्रुप में भक्तों की कमी।

             मेरी कविताओं से अपनी आंखें धो लो।
                     अपने मुख से श्री राधे राधे बोलो।

आ रहा हूं ग्रुप में दर्शन कर लेना ,
         अपनी सारी चिंता मुझे दे देना ,

                  बदले में ग्रुप में कमेंट कर देना,
                             प्रेम से बोलो राधे राधे,

चलो अब ग्रुप में अपना अपना नाम बताओ।
 अपने श्री मुख से श्री राधे राधे कह जाओ।
                               
                   मेरा नाम  ___निशि द्विवेदी, राधे राधे

रो रो के समंदर भर देते हैं लोग।




नाम____निशि द्विवेदी
बोल___प्रकृति भी रो देती है ।

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कभी सोचा है गांव में तालाब ,
                           और शहरों में समुंदर क्यों होते हैं।
आवादी जितनी घनी,
                              तकलीफ उतनी बड़ी होती है।
छिप छिप कर रोते हैं लोग,
                                     आंसू दिखा सकते नहीं ।
क्योंकि उनके आंसू पर,
                            हंसने वालों की कोई कमी नहीं।
जबकि गांव में संस्कारों की,
                                      कमी कोई नहीं होती है।
गांव में पड़ोसी पर दुख पड़ने से ,
                          पड़ोसी के घर चूल्हा नहीं जलता।
 रोने पर संभालने वालों की
                                      कमी भी नहीं होती है।
पाप करने से बचते हैं गांव के लोग,
                                  शहर के तो हाल ना पूछो।
पाप करने से डरते नहीं है लोग,
                               तोहफे में देते हैं दुख, शोक।
प्रकृति भी रो देती है,
                             नासमझ देखकर ऐसे लोग।
जमीर को मार कर ही,
                           ऊंची बिल्डिंग में रहते हैं लोग।
मकान तो बढ़िया  मगर सोच ,
                                    घटिया बना लेते हैं लोग।
समुंदर हिलोरे ले कर कुछ समझाता है,
                                       समझते नहीं है लोग।
पाप के समंदर को रोज-रोज,
                                      बढ़ाए जा रहे हैं लोग।
इंसानी कंधों को सीढ़ी ,
                               बनाकर चढ़े जा रहे हैं लोग।

Saturday, 20 June 2020

अब हो जाए चाय का प्याला।

  नाम___निशि द्विवेदी
एक चाय के प्याले के साथ,
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सांझ ढल रही है
                       निशा का निमंत्रण है।
आओ बैठे चाय पर हम,
                              कुछ बातें आपस में कर ले,
 कुछ तुम अपनी कह लो,
                                     कुछ मेरी भी सुन लो,
 मिल जुल बुनेंगे ताना-बाना,
                               साथ में होगा चाय का प्याला,
कुछ मीठी नमकीन बिस्किट होंगे,
                                  कुछ बातें होंगी खट्टी मीठी,
 कुछ पल साथ बैठकर हम तुम,
                                  पुरानी यादों को दोहराएंगे।
 जब मिले थे पहली बार ,
                                 तुमको हमसे हुआ था प्यार,
सांझ ढले देखा था तुमको,
                               कुछ धुंधला सा याद भी होगा,
सारी रात तुम जागे होगे,
                                  तुम्हें भी नींद ना आई होगी,

                स्वरचित रचनाकार____ निशि र्द्विवेदी

निशा का निमंत्रण है,




 नाा____निशि द्विवेदी
पथिक तनिक ठहर जाओ।

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पथिक तनिक ठहर जाओ, 
                                   निशा का निमंत्रण है।
 निशा का आगाज हुआ है,
                                   निशा देती निमंत्रण है।
ठहरना भी तेरा जरूरी है,
                                    निशा का आमंत्रण है।
प्रकृति का संकेत हुआ है,
                                     निशा का निमंत्रण है।
दिन पराया रात अपनी,
                                    अपनों का निमंत्रण है।
सो जाओ तुम मीठी नींद,
                                     सपनों का निमंत्रण है।
बाहे पसारे निशा पुकारे,
                    आगोश में लो तुम्हारा अभिनंदन है।
भूलकर सारे काम तुम्हारे ,
                                      निशा देती निमंत्रण है।

Friday, 19 June 2020

मेरे घर का पता है। जब दिल चाहे आ जाना।।

नाम____निशि द्विवेदी
 शहर किनारे हैं कुटिया मेरी,
एक बार जरूर आ जाना।
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द्वार सदियों से खुला पड़ा है
 जब दिल चाहे आ जाना।

ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं है
 ना ही अमीर गरीब का भाव है।

मन की सुंदरता अनिवार्य बड़ी है
 जब दिल चाहे आ जाना।

जलपान में हृदय परोसेंगे।
भोजन में शब्दों के पकवान मिलेंगे।

 जब जी चाहे आ जाना।
ठहरो मेरा पता भी सुन लो ।

कैसे आना है यह जान भी लो।
"फेसबुक" स्टेशन से मेरे घर तक ।

कोई मोड़ मोड़ाओ नहीं है।
"निशा निमंत्रण ग्रुप "चौराहे से,

 मेरे घर तक सीधी गली है।
द्वार तक मेरे आ जाना,

दरवाजे पर कड़ी नहीं है,
निशि नाम है मेरा बस,

 याद तुम्हें इतना रखना है। 
घर मेरे आमंत्रण है,

 बस याद तुम्हें इतना रखना है
 जब जी चाहे आ जाना 

द्वार मेरा खुला पड़ा है,
वीरान पड़ी है कुटिया मेरी,

 जब जी चाहे आ जाना।
स्वागत है मेरी कुटिया में,

 जब जी चाहे आ जाना।
बैठ के संग में बातें होंगी।

भावों की कोई कमी नहीं है
 भाव तुम्हें भरपूर मिलेंगे।

कान्हा का भी आना होता है ,
दर्शन तुम्हें कराएंगे।

साथ बैठकर गपशप होगी।
 मन मलीनता को दूर करेंगे।

भावों के चूल्हे पर ।
भक्ति की रोटी पकाएंगे।

कविता की थाली में रखकर
आनंद के साथ खाएंगे।

खाने पीने की कोई कमी नहीं है।
 मास्टर शेफ बहुत है ।

हर तरह के व्यंजन होंगे ।
जैसा तुम खाना चाहोगे।

आकर वापस जाना पाओगे 
साथ यही बसना है हमको।

***"""""****""""स्वागतम्****""""****""""




Wednesday, 17 June 2020

भारत के सपूतों को सच्ची श्रद्धांजलि

नाम____निशि दिवेदी
है नमन शहीदों को, करो नमन शहीदों को


 उन मां के लालो को,
     उन वीर जवानों को,
          जो शहीद देश पर हुए,
                जो छोड़ हमें चल दिए,
                        करो नमन शहीदों को ,

करो नमन शहीदों को,
    उन भारत के वीरों को,
       खून से तिलक करते-,
           करते गोलियों से आरती,
              उन शहीदों को शहादत पुकारती,

करो नमन शहीदों को,
      उन अमर शहीदों को,
            उन वीर सपूतों को,
                जो देश के लिए जीते,
                      देश पर ही मर मिटते,

करो नमन शहीदों को,
      उन चौकीदारों को,
        जो देश की रक्षा करते,
           जो तिरंगे के लिए जीते,
               अंत तिरंगे में लिपट के,

है नमन शहीदों को,
     देश के सिपाहियों को,
         रणभूमि के मतवालों को,
              उन हिम्मत वालों को,


कोरोना मैं जीवन ठहर सा गया है।

रचनाकार का नाम ____निशि द्विवेदी
वक्त का दरिया ठहर सा गया है ।
कोरोना का कहर फैल गया है।

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वक्त का दरिया ठहर सा गया है
सोचा ना था जैसा वैसा हो गया है
जीवन अचानक बदल सा गया है
सभी का ढंग बदल सा गया है।

तरक्की ने साथ छोड़ दिया है
 डर ने जैसे घर कर लिया है
मन अचानक बदल सा गया है
रिश्तो ने मन बदल सा लिया है।

महामारी ने अंधेरा किया है।
आशा नहीं दिखती कहीं है।
शाम से सीधा सुबह होती थी।
 रात अंधेरा ठहर सा गया है ।

सवेरा कहीं खो सा गया है
अंधेरा बिलख के रो गया है।
चकाचौंध कहीं दिखती नहीं है।
अंधेरों ने जिगर में घर कर लिया है।

मातम धरती पर छा गया है।
पैसो के पीछे दौड़ते थे जो रोज,
परिवार पकड़कर घर में छुपे हैं लोग।
वही पैसा सड़कों पर बिखरा पड़ा है,

दफनाने को लाशें जमी नहीं है।
 घाटों पर लकड़ी की कमी है।
 रिश्ते निभाने में डरते हैं लोग।
 अंतिम यात्रा मैं साथ जाता नहीं है।

आज किसी को गले लगाता नहीं है।
कोई किसी से हाथ मिलाता नहीं है।
कोई किसी के घर जाता नहीं है ।
कोई किसी को घर बुलाता नहीं है।

करोना ने इस कदर है डराया।
पैसा किसी को कमाना नहीं है।
बच्चों को स्कूल में पढ़ाना नहीं है।
पार्टी में किसी को जाना नहीं है।

प्रतिस्पर्धा का रहा जमाना नहीं है।
होटल में जाकर खाना खाते थे जो।
 घरों में बैठकर रोटी पका रहे हैं।
  पुराने कपड़ों में काम चला रहे हैं ।

 लाखों की जो बातें करते थे फोन पर।
  फोन से दाल चावल आटा मंगा रहे हैैं।
पैसा बचाने के नाम पर रोते थे जो लोग।
 आज बैंक से निकाल कर खा रहे हैं ।





खोने का डर

जितनी शिद्दत तुम्हें पाने की थी                 उससे ज्यादा डर तुम्हें खोने का है बस यही है कि तुमसे लड़ती नहीं           तुम यह ना समझना कि...